पुस्तक मेले का भ्रमण

पुस्तक मेले का भ्रमण

विश्व पुस्तक मेले की रोमांचक यात्रा

एक छोटे से गाँव बोंद्रा से ताल्लुक रखने वाले प्रकाशचंद को किताबों से गहरा लगाव था। वह हमेशा नई-नई किताबें पढ़ने और ज्ञान अर्जित करने के लिए उत्सुक रहते थे। जब उनको पता चला कि प्रगति मैदान, नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला आयोजित हो रहा है, तो उन्होंने ठान लिया कि अपने कार्य परिवेश की व्यस्तता के बावजूद उनको इस मेले को देखकर आना है इसलिए कि प्रकाशन उद्योग में क्या नए बदलाव हो रहे हैं और पाठकों की रुचि किस ओर जा रही है।

दिल्ली की ओर सफर

सुबह की अपने गांव से गुजरने वाली बस पकड़कर प्रकाशचंद दिल्ली के लिए रवाना हुए। उनके मन में उत्सुकता थी कि वो इतने वर्षों से इस बड़े पुस्तक मेले में जा रहे हैं तो देखते हैं कि इस वर्ष का अनुभव पहले की तुलना में कितना भिन्न रहेगा? जैसे ही वह प्रगति मैदान पहुँचे, तो वहाँ की भीड़ का नज़ारा देखकर उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। विशाल मैदान में सैकड़ों स्टॉल लगे थे जिन पर अपार जनता अपनी जिज्ञासा पहुंचकर शांत करने का प्रयास कर रही थी। वहाँ हर तरह की पुस्तकें उपलब्ध थीं—धार्मिक, साहित्यिक, विज्ञान, राजनीति, बच्चों की किताबें, और न जाने कितनी ही विधाओं की पुस्तकें।

चकित करती पाठकों की अपार भीड़

प्रकाशचंद को इस बात का अंदाजा नहीं था कि किताबों के प्रति इतनी बड़ी संख्या में लोग आकर्षित हो सकते हैं। उन्होंने सोचा था कि आजकल लोग मोबाइल और इंटरनेट में अधिक व्यस्त रहते हैं, लेकिन यहाँ आकर उनका यह भ्रम टूट गया। हर आयु वर्ग के लोग किताबें खरीदकर और पढ़कर अपनी जिज्ञासा को शांत करने में व्यस्त दिखे। छोटे बच्चे अपनी पसंद की कॉमिक्स और विज्ञान की पुस्तकें खरीद रहे थे, तो युवा उपन्यासों और प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की ओर आकर्षित थे, वहीं बुजुर्ग अपने पसंदीदा साहित्यकारों की रचनाओं को खोज रहे थे।

प्रकाशन संबंधी बदलाव और नई तकनीक

प्रकाशचंद ने देखा कि आज के प्रकाशन उद्योग में डिजिटल बुक्स, ऑडियो बुक्स और ई-पुस्तकों की भी अच्छी-खासी मांग है। कई स्टॉल पर लेखक स्वयं मौजूद थे और वे अपने पाठकों से संवाद कर रहे थे। कुछ जगहों पर नई पुस्तकों का विमोचन हो रहा था, तो कहीं साहित्यिक चर्चाएँ चल रही थीं। यह सब देखकर प्रकाशचंद को महसूस हुआ कि किताबों की दुनिया जितनी गहरी और पुरानी है, उतनी ही आधुनिक भी हो रही है।

मेले से मिली सीख

इस यात्रा के दौरान प्रकाशचंद को यह समझ आया कि किताबों के प्रति रुचि अभी भी जीवित है और पाठकों का एक बड़ा वर्ग ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। उनको यह भी अहसास हुआ कि अगर गाँवों में भी इस तरह के पुस्तक मेले आयोजित किए जाएँ तो वहाँ के लोगों में पढ़ने की आदत को और बढ़ावा मिल सकता है।

जब वह वापस गाँव लौटे, तो उनके मन में एक नई ऊर्जा थी। अब उसका सपना था कि वह अपने गाँव में एक पुस्तकालय खोलें या फिर खुलवाने में मदद करें, जहाँ पर हर आयु वर्ग के लोग ज्ञान की इस अनमोल दौलत से लाभान्वित हो सकें।

प्रकाशचंद की यह यात्रा सिर्फ एक मेला देखने की यात्रा नहीं थी, बल्कि यह उनके लिए एक नया दृष्टिकोण लेकर आई। उन्होंने सीखा कि पुस्तकें सिर्फ ज्ञान का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे पूरे समाज को शिक्षित और विकसित करने की ताकत भी रखती हैं।

पुस्तकें जिन्होंने उनको आकर्षित किया

प्रस्तुति