मुक्तक
सरकारी की दुनिया में, निजी का मान घट जाता है,
राजा की गलती पर वाहवाही, तो नौकर पिट जाता है,
ईमानदारी से दो वक्त की रोटी कमाने वाला व्यक्ति,
धनवानों व झूठी शान वालों के आगे मिट जाता है।।
कविता
ना मैं मंच का कवि हूँ, ना मैं प्रपंच का कवि हूँ,
ना मैं शाम का रवि हूँ, ना मैं इस शहर का नबी हूँ,
निकला था मैं दुनिया में ज्ञान बाँटने, पर मेरा वहम टूटा।
अब केवल मैं परिवार व बच्चों के लिए निर्मल छवि हूँ।।
फिर से कोई सच्चा मार्गदर्शक जीवन में आयेगा,
जामवंत, अंगद की तरह हनुमान की शक्ति जगायेगा।
सागर भी पार होगा, सीता भी मिलेगी, लंका भी जलेगी,
फिर माँ भारती का वंदन होगा, मंगल कलम चलायेगा।
आप सबने मेरा साथ निभाया, बहुत बहुत धन्यवाद,
आप ने ही साहित्य का चखाया था मुझे स्वाद,
निजी कारणों से व्यस्त हूँ, परिष्कृत नहीं हो पाता।
इसलिए लिखने से अपनेआप को करता हूँ आजाद।।