कविता

कविता

उत्तरायण

भीतर का सूर्योदय

अंधकार से प्रकाश की ओर, यह क़दम बढ़ाना है,
दक्षिणायन की निद्रा त्याग, अब जाग्रत हो जाना है।
मकर राशि में सूर्य का प्रवेश, एक नया संदेश लाता है।
जड़ता छोड़कर चेतन की ओर, जीव का मार्ग बनाता है।
अंबर में उड़ती पतंगें,
मन की ऊँची उड़ानें हैं,
पर डोर अगर प्रभु हाथ हो, तो ही जीवन महान है।
जैसे पतंग काटती है हवा को, ऊँचाइयों को पाने को,
वैसे ही ज्ञान काटता है भ्रम को, सत्य को पहचानने को।
यह देह एक पतंग है कच्ची, श्वासों की पतली डोर है,
लक्ष्य रहे बस ऊर्ध्वगामी, जहाँ शांति का ओर-छोर है।
तिल-गुड़ की मिठास में, अहंकार को घोल दें,
प्रेम की भाषा अपनाकर, मन के कपाट खोल दें।
आज दान का महापर्व है, स्वयं को अर्पण करना सीखें,
बाहर के सूर्य के साथ-साथ, अंतर्मन में उतरना सीखें।

रचनाकार

डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद (गुजरात)

प्रस्तुति

कल्पनाकार है शब्दशिल्प
प्रस्तुतकर्ता