कलम का विस्तार

कलम का विस्तार

प्रस्तावना 

कलम का विस्तार’ केवल शब्दों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि विचारों की गहराई, संवेदना की व्यापकता और दृष्टिकोण की परिपक्वता का नाम है। वह समय जब माया शर्मा जी जैसा लेखक अनुभव, आत्ममंथन और समाज से जुड़े सरोकारों के साथ आगे बढ़ता है, तब वह सीमाओं को लांघकर पाठक के अंतर्मन तक पहुँच जाता है। यहाँ  पर संकलित कविता और कहानी उस यात्रा का संकेत देते हैं, जहाँ लेखिका अपने विचारों को सतही अभिव्यक्ति से निकालकर अर्थ, भाव और उद्देश्य की पूर्णता तक ले जाती है। ‘कलम का विस्तार’ रचनाओं को केवल पढ़ने भर के योग्य नहीं, अपितु महसूस करने योग्य बनाता है।

ठिठुरता सूरज

(कविता)

ठिठुरता सूरज प्राथी बन कह रहा

अब तो रहम कर मुझ पर ए सर्द हवा।

मैने तुझे तपिश से क्या जलाया था कभी?

जो तूने मुझे इतनी ठिठुरन इस बार दी थमा।

लोग कहने लगे हैं कि सूरज लग रहा थक रहा,

कैसे उन्हें बताऊं अपनी मैं मजबूरी भला।

जिसकी तपिश से ब्रह्मांड झुलस जाता था,

आज वो सर्द हवा से रहम करने को कह रहा।

अब तो मुझे भी खुल के जी लेने दे जरा

कम कर दे अपना कहर अब तो मुझको न सता।

स्वरचित

अच्छाइयाँ लौट कर आती हैं

(कहानी)

रीमा आज नौकरी के लिए इंटरव्यू देने उदयपुर जा रही थी।

रीमा का स्टेशन पर आगमन
ट्रेन 🚆 की प्रतीक्षा में रीमा

ट्रेन में जाते वक्त रास्ते में उसकी मुलाकात राधव से होती है।

ट्रेन 🚆 में बैठी रीमा
राहुल से मुलाकात

बात ही बात में दोनों में दोस्ती हो जाती है। दोनों एक दूसरे के मोबाइल नंबर ले लेते हैं। रीमा उदयपुर स्टेशन आने पर ट्रेन से उतर जाती है। जल्दी बाजी में वो अपना बेग ट्रेन में ही भूल जाती है। घर पहुंचने पर उसे याद आता है कि वो अपना एक बैग ट्रेन में ही भूल गई है।वो बहुत परेशान हो जाती है। तभी उसे याद आता है कि ट्रेन में ही उसने राघव के नंबर लिए थे।वो झट से राघव के नंबर डायल करती है। राघव अगले स्टेशन पर उतरने ही वाला था। तभी रीमा उसको बताती है कि वो अपना बैग ट्रेन में भूल आई है। राघव को जब पता लगता है कि सच में उसका बैग ट्रेन में ही है तो वह रीमा को कहता है कि वो चिंता न करे।राघव उसका बैग अपने साथ ले जाता है। दो दिन बाद रीमा के घर के दरवाजे पर डोरवेल बजती है।रीमा की मां दरवाज़ा खोलती है और पूछती है कि “कौन हो तुम,क्या काम है”

तभी राघव की आवाज कानों में पड़ते ही रीमा दौड़ कर बाहर आती है और बोलती है। अरे! राघव,तुम यहां। कैसे? और मेरा बैग तुम्हारे पास। भगवान को धन्यवाद देते हुए रीमा

राघव को हाथ पकड़ते हुए घर के अंदर ले आती है। रीमा की मां के पूछने पर रीमा उनको राघव से उसकी मुलाकात और बैग खो जाने वाली सारी बात बताती है। रीमा और उसकी मां राघव की धन्यवाद कहती है तब राघव कहता है कि आंटी जब हम किसी का भला करते हैं तो भगवान हमारा बुरा कैसे होने दे सकता है। रीमा ने ट्रेन में एक गरीब की मदद उस समय की थी जब कोई भी उस की मदद को तैयार नहीं था । तो फ़िर रीमा के साथ भगवान कैसे बुरा होने दे सकते थे।

माया शर्मा/स्वरचित