16 दिसंबर : मेरे लिए ‘विजय दिवस’
16 दिसंबर मेरे जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इसके दो गहरे और अविस्मरणीय कारण हैं।
पहला कारण
16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के रणबांकुरों ने पाकिस्तान को युद्ध में परास्त किया। युद्ध कौशल के महारथी जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा जी के समक्ष लगभग 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने घुटने टेककर आत्मसमर्पण कियाप। यह दिन भारत के शौर्य, पराक्रम और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है।
दूसरा कारण
यह दिन मेरे लिए असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, अधर्म पर धर्म की विजय का दिन है। इसी कारण मैं इस दिन को अपने जीवन की विजयादशमी के रूप में भी मनाता हूँ। इसका संबंध मेरे सेवा काल की एक महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना से है।
पृष्ठभूमि
झाँसी वैगन रिपेयर कारखाना, वर्ष 2008
वर्ष 2008 की बात है।
भारतीय रेलवे का सबसे बड़ा वैगन रिपेयर कारखाना झाँसी में स्थित है, जहाँ लगभग 5000 कर्मचारी कार्यरत हैं। उस समय स्थिति यह थी कि कार्मिक (Personnel) विभाग में जूनियर क्लर्क से लेकर मुख्य कार्यालय अधीक्षक तक, लगभग 12 वर्षों से किसी का भी प्रमोशन नहीं हुआ था। कारण बताया जाता रहा— हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर।
जबकि प्रशासन का दायित्व केवल हाथ पर हाथ धरे बैठना नहीं होता। स्टे हटवाना, या न्यायालय से स्पष्ट दिशा-निर्देश प्राप्त करना भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का ही हिस्सा है।
उस समय के वरिष्ठ कार्मिक अधिकारी स्वयं प्रमोशन पाकर झाँसी कारखाने से झाँसी मंडल स्थानांतरित हो गए। उनके स्थान पर नए वरिष्ठ कार्मिक अधिकारी आए, जो प्रशिक्षण हेतु बड़ौदा चले गए।
मैं उस समय कार्य प्रबंधक के पद पर था और साथ ही मुझे वरिष्ठ कार्मिक अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
नेतृत्व : श्री अजय कुमार सिंह
उस समय मुख्य कारखाना प्रबंधक श्री अजय कुमार सिंह थे—
एक अत्यंत ईमानदार, निर्भीक, साहसी और कर्मचारियों के हितों के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाले अधिकारी।
जहाँ भी वे पदस्थ रहे, कर्मचारियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय रहे। भारतीय रेलवे में उनके कई किस्से आज भी उदाहरण के रूप में सुनाए जाते हैं।
जब उन्हें प्रमोशन रुके होने की जानकारी हुई, तो उन्होंने मुझे पूरे प्रकरण का अध्ययन कर तत्काल फाइल प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

न्यायालय का आदेश और प्रशासनिक सत्य
मामला यह था कि—
* श्री अग्रवाल (1981 की सीनियरिटी)
* श्री मिश्रा (1996 की संशोधित सीनियरिटी)
1996 में संशोधित सीनियरिटी में श्री मिश्रा को श्री अग्रवाल से वरिष्ठ दिखाया गया।
श्री अग्रवाल ने इसके विरुद्ध न्यायालय का रुख किया।
कोर्ट का स्पष्ट आदेश था
“No action should be taken on the basis of revised seniority of 1996.”
अर्थात—
1996 की संशोधित सीनियरिटी के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन 1981 की मूल सीनियरिटी के आधार पर प्रमोशन पर कोई रोक नहीं थीl।
रिक्त पदों की स्थिति यह थी—
* मुख्य कार्यालय अधीक्षक : 11 पद
* कार्यालय अधीक्षक (द्वितीय) : 58 पद
➡️ कुल 69 पदों पर प्रमोशन होना था।
ऐतिहासिक आदेश
कार्मिक विभाग द्वारा 12 पृष्ठों का विस्तृत नोट तैयार किया गया।
मैंने उसे अपने विवेक के साथ मुख्य कारखाना प्रबंधक श्री अजय कुमार सिंह के समक्ष प्रस्तुत किया।
उन्होंने पूरा नोट ध्यानपूर्वक पढ़ा और यह आदेश पारित किया—
> “I have examined the case in detail and come to the following conclusion:
> 1. The situation is stagnated from last ten to twelve years and will soon come in the category of Ramjanm Bhoomi & Babri Masjid where no result is expected till 2099.
> 2. Issue all promotion orders from page 1 to 12 by 26.04.2008 without fail.”
> (A.K. Singh)
आदेश की तिथि : 25.04.2008
अनुपालन की अंतिम तिथि : 26.04.2008 (Without fail)
आंदोलन, तबादला और साहस
इसी बीच यह अफवाह फैलाई गई कि श्री सिंह को सस्पेंड कर दिया गया है।
कर्मचारियों ने स्वतःस्फूर्त हड़ताल कर दी—
एक ही माँग:
> “जब तक सिंह साहब ड्यूटी पर नहीं आएँगे, हम काम पर नहीं जाएँगे।”
दो दिन तक पूरा कारखाना बंद रहा।
अंततः श्री सिंह का तबादला चेन्नई कर दिया गया।
स्थानांतरण पत्र में लिखा गया—
“आप झाँसी नहीं जाएँगे, इलाहाबाद से सीधे चेन्नई जाएँगे।”
महाप्रबंधक महोदय ने स्वयं पत्र दिया।
श्री सिंह ने लिखा—
> “Received with thanks.”
> और चेन्नई के लिए प्रस्थान कर गए।
मानवता की पराकाष्ठा
अगले दिन दोपहर लगभग 1:30 बजे,
ट्रेन से जाते हुए श्री सिंह का फोन आया—
> “भाटी, दूसरे प्रमोशन (Office Superintendent-II) का क्या हुआ?”
यह प्रश्न मुझे भीतर तक झकझोर गया।
अपने परिवार, बेटियों और व्यक्तिगत कठिनाइयों से ऊपर उठकर—
उन्हें अब भी कर्मचारियों की भलाई की चिंता थी।
मैंने उसी दिन 58 पदों पर Office Superintendent-II के प्रमोशन आदेश
Back Date 26.04.2008 से जारी कर दिए।
इस प्रकार—
* 11 पद
* 58 पद
➡️ **कुल 69 प्रमोशन पूर्ण हुए**
जांच, आरोप और सत्य
बाद में मेरे विरुद्ध Major Charge Sheet जारी की गई।
प्रमोशन आदेशों पर मेरे हस्ताक्षर थे।
श्री अजय कुमार सिंह चेन्नई से जाँच में आए और स्पष्ट कहा
> “I am responsible for this. He only followed my orders. Take action on me.”
यह दुर्लभ उदाहरण है—
जहाँ कोई बॉस, जूनियर के नेक कार्य की पूर्ण जिम्मेदारी स्वयं लेता है।
जाँच में यह सिद्ध हुआ कि—
* प्रमोशन पर कोई स्टे नहीं था
* केवल Interpretation का भ्रम था
* आदेशों में स्पष्ट लिखा था:
“Subject to outcome of court case”
अंततः मैं सम्मानपूर्वक आरोपों से बरी हुआ।
इन 69 प्रमोशन के कारण Cascading Effect से
कार्मिक विभाग के लगभग 500 कर्मचारियों के प्रमोशन संभव हुए।
अंतिम विजय
16 दिसंबर 2009 को जांच का निर्णय आया—
और उसी दिन असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय, अधर्म पर धर्म की विजय हुई।
इसीलिए मैं 16 दिसंबर को वर्ष में दो बार विजयादशमी के रूप में मनाता हूँ
समर्पण
श्री अजय कुमार सिंह जैसे अधिकारी बहुत कम होते हैं—
जो केवल प्रशासन नहीं, बल्कि न्याय की जीवित संस्था होते हैं।
रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियाँ उन पर पूर्णतः सार्थक होती हैं—
> “जहाँ शस्त्र बल नहीं, शास्त्र पछताते और रोते हैं।
> ऋषियों को भी सिद्धि तभी तप से मिलती है,
> जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं।”
विजय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
धन्यवाद।
सूचना स्रोत
श्री तेज सिंह भाटी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




