भूमिका
एक छोटा-सा प्रश्न आपके मन में आज भी कहीं बैठा होगा…क्या आपने कभी किसी पल में बिना सोचे, बिना रुके, बस दिल से निकलते हुए कहा था —
“अरे… कितना प्यारा!”? वह पल जब तर्क नैसर्गिक तरीके से पराजित हो जाता है, शब्द बेकाबू हो जाते हैं, और मन अपनी सारी बागडोर छोड़कर सिर्फ़ महसूस करने लगता है।
एक नन्हा आँखें मटकाता हुआ पैट…
माँ की गोद में मुस्कुराता नवजात…
पहाड़ों पर सूरज की लाल किरणें…
या फिर किसी अनजान की छोटी-सी दयालुता… आख़िर! इन क्षणों में होता क्या है?
मन क्यों वश में नहीं रहता?
प्रकृति ने यह व्यवस्था क्यों बनाई कि कुछ देखते ही जीभ पर वही दो शब्द अनायास आ जाएँ — “कितना प्यारा!”?
क्या यह सिर्फ़ भावना है, या इसके पीछे कोई गहरी जैविक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक सच्चाई छिपी है?
क्या प्यारा कह देना हमारी कमज़ोरी है… या सबसे खूबसूरत ताकत?आज इसी उलझन को सुलझाने की कोशिश में लिखा गया है प्रस्तुत आलेख —
“कितना प्यारा है यह!” — वह अनियंत्रित पल जब हम सबसे ज़्यादा इंसान बन जाते हैं। अगर आप भी कभी ऐसे पलों में खो चुके हैं…
अगर आप भी जानना चाहते हैं कि यह प्यारा का जादू आखिर कैसे काम करता है…
तो थोड़ा रुकिए।
गहरे साँस लीजिए।
और पढ़िए…क्योंकि कभी-कभी सुलझन उतनी ज़रूरी नहीं होती,
जितना उस उलझन को जीना और महसूस करना ज़रूरी होता है। शुरू करते हैं?
यह भूमिका भावनात्मक रूप से जोड़ती है और जिज्ञासा जगाती है।
पोर्टल शीर्षक uljhansuljhan.in से सीधा तालमेल रखती है।
पाठक को व्यक्तिगत स्तर पर संबोधित करती है।
पढ़ने के लिए एक विनम्र लेकिन प्रबल आग्रह करती है।
कितना प्यारा है यह!
जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जब मन अपनी सारी बागडोर खो बैठता है। कुछ कुछ इतने गहरे तक छू जाता है कि शब्द बिना सोचे-समझे, बिना किसी पूर्व नियोजन के, मुंह से स्वतः निकल पड़ते हैं – “अरे, कितना प्यारा है यह!”
यह कोई योजनाबद्ध प्रशंसा नहीं बल्कि एक स्वाभाविक उद्गार है। जैसे कोई बाँध टूट जाए और पानी अपने आप बह निकले।
एक छोटा सा पैट, आँखें मटकाता हुआ, लंबे कान झुकाए, तुम्हारी ओर देखता है। बस। एक सेकंड में मन कह उठता है –
“ओ माय गॉड! कितना प्यारा है यह तो!”
या फिर कोई नवजात शिशु, पहली बार मुस्कुराता हुआ। उसकी मुस्कान में न कोई कला है, न कोई दिखावा। फिर भी दिल पिघल जाता है। जीभ पर वही शब्द आ जाता है – कितना प्यारा!
कभी पहाड़ों पर सूर्यास्त देखते हुए, जब सारे आकाश लाल-नारंगी हो जाते हैं, नदी सोने की धारा बन जाती है – तो भी वही अनायास आवाज़ निकलती है। या फिर माँ के हाथ का बना खाना, पहला कौर जब जीभ पर रखते हो और स्वाद ऐसा कि आँखें बंद हो जाती हैं। या किसी अपरिचित की छोटी सी दयालुता, जिसे देखकर मन भर आता है।ये सब अलग-अलग चीज़ें हैं – कोई चीज़, कोई स्वाद, कोई भावना, कोई एहसास। लेकिन प्रतिक्रिया एक ही: मन वश में नहीं रहता।तो आखिर होता क्या है?विज्ञान इसे “Kindchenschema” कहता है – कोंराड लॉरेंज़ ने इसे बताया था। शिशु या शिशु-सदृश विशेषताएँ (बड़े नेत्र, गोल चेहरा, छोटी नाक) देखते ही मस्तिष्क में देखभाल की प्रवृत्ति जागृत होती है। डोपामाइन छूटता है, दिल तेज़ धड़कता है, और भावना इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे शब्दों में बाँधना मुश्किल हो जाता है।जब कोई चीज़ “बहुत” प्यारी, बहुत सुंदर, बहुत विशाल लगती है, तो मस्तिष्क का तर्कशील हिस्सा थोड़ा पीछे हट जाता है। भावनाओं का केंद्र (लिंबिक सिस्टम) सक्रिय हो जाता है। खुशी इतनी अधिक हो जाती है कि उसे “ओवरफ्लो” करना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे बहुत ज़्यादा पानी हो तो गिलास से बाहर बह जाता है।कुछ वैज्ञानिक इसे “cute aggression” भी कहते हैं – जब प्यार इतना ज़्यादा हो कि दाँत पीसने या चीखने की इच्छा होती है। लेकिन ज़्यादातर मामलों में यह सिर्फ़ शब्दों में निकलता है – “कितना प्यारा!”प्रकृति ने यह व्यवस्था क्यों बनाई?क्योंकि यह हमें जोड़ती है। यह हमें देखभाल सिखाती है। यह हमें याद दिलाती है कि हम सिर्फ़ तर्क नहीं, भावनाएँ भी हैं। जब हम किसी चीज़ को “प्यारा” कहते हैं, तो हम उसके साथ एक अटूट रिश्ता बना लेते हैं। हम उसे बचाना चाहते हैं, उसके करीब जाना चाहते हैं, उसकी रक्षा करना चाहते हैं।यह मनुष्य होने की सबसे सुंदर कमज़ोरी है – वह क्षण जब हम अपनी सारी चतुराई भूलकर सिर्फ़ महसूस करते हैं।अगली बार जब कोई चीज़ तुम्हें इतनी छू ले कि मन काबू से बाहर हो जाए और तुम अनायास कह उठो – “कितना प्यारा है यह!” – तो रुकना मत। बस महसूस करो क्योंकि यही पल हमें सबसे ज़्यादा इंसान बनाते हैं।
कल्पनाकार



