भूमिका
यह कविता पन्ना धाय के अद्वितीय त्याग और राजधर्म के प्रति उनकी निष्ठा को आल्हा छंद की वीर रसात्मक लय में प्रस्तुत करती है। कवि श्योराज जी बम्बेरवाल ‘सेवक’ ने इतिहास को केवल कथा नहीं, बल्कि मूल्य और संस्कार के रूप में रूपायित किया है। मातृत्व की वेदना और राष्ट्रहित के कर्तव्य के बीच पन्ना के कठिन निर्णय को कविता संवेदनशीलता और विवेक के साथ उजागर करती है। यह रचना पाठक को त्याग, साहस और कर्तव्यबोध के शाश्वत मूल्यों पर विचार करने की प्रेरणा देती है।
आल्हा छंद
।।पन्ना।।

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगा कर सारे आज
त्यागी जिसने ममता अपनी, करने को परहित के काज।
कर्णावती ने कर दिया था, अपने तन का जब बलिदान
पन्ना को सौंपा उदय सिंह, कहकर इसका रखना ध्यान।
चंदन जैसा इसे मानना, अपने ही निज पूत समान
करना मुझ मां दुखियारी पर, बस इतना सा तुम एहसान।
वायदा किया पन्ना ने जब, चिपका हिय कर करती नाज
पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।
गोद उठाया उदय सिंह को, मेवाड़ धरा को कर प्रणाम
भोज कराती दूध पिलाती, करती खुद ही सारे काम।
राणा सांगा रहे नहीं थे, अत्याचारी था बनवीर
छल से मार विक्रमादित्य को, अब था उदय खातिर अधीर।
पड़ी भनक जब थी पन्ना को, समझ गई सारा ही राज
पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।
बारी को बुलवाकर उसने, दिया उदय को कुम्भल भैज
चंदन को दे दी थी उसने, उदय सिंह की प्यारी सेज।
आया बनवीर महल में जब, कर में लेकर के तलवार
समझ उदय ही चंदन को झट, किया जोर से उसपे वार।
नैनों से अश्रु निकल पड़े थे, दबा गई फिर भी आवाज
पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।
राज धर्म के खातिर जिसने, दिया हाथ से सब-कुछ त्याग
छोड़ा जिसने राज धर्म हित, आप पूत का भी अनुराग।
ऐसी माता कहां मिलेगी, पूछ रहा है ये संसार
जान बचाकर उदय सिंह की, किया खूब ही था उपकार।
जिसके कारण उदय सिंह को, मिला यहां मेवाड़ी ताज
पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।
रचनाकार
श्योराज बम्बेरवाल ‘सेवक’
मालपुरा
कल्पनाकार व प्रस्तुति


