आत्मकथ्य
डॉ. अशोक कुमार चौधरी
अखिल भारतीय साहित्य परिषद की जनपदीय इकाई द्वारा आयोजित ‘संघ साहित्य एवं राष्ट्रभाषा’ विषयक विचार गोष्ठी में सम्मानित होना मेरे लिए केवल व्यक्तिगत गौरव का क्षण नहीं,

बल्कि हिंदी भाषा और राष्ट्रवादी चिंतन के प्रति मेरे आजीवन समर्पण की सार्थकता का प्रतीक है। संघ की शतकीय यात्रा के उपलक्ष्य में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में उपस्थित होकर मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो मैं किसी वैचारिक तीर्थ में उपस्थित हूँ, जहाँ शब्द साधना और राष्ट्रभाव एक साथ स्पंदित हो रहे हों।
जब जिलाध्यक्ष डॉ. यतींद्र कटारिया ने हिंदी को भारत की आत्मा और साहित्य का श्रृंगार कहा, तो मुझे अपने लेखन जीवन के वे सभी क्षण स्मरण हो आए, जब मैंने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अपने संस्कारों और चेतना की धड़कन के रूप में जिया है। प्रांतीय संगठन मंत्री श्री रमेश चंद्र द्वारा हिंदी को भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति बताया जाना इस सत्य की पुनः पुष्टि है कि भाषा केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि वह सभ्यता का संवाहक होती है।
मैंने अपने उद्बोधन में यही निवेदन किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षपूर्ण काल से लेकर आज के डिजिटल युग तक हिंदी ने राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया है। यह भाषा सीमाओं में बंधी नहीं है; यह विश्व मंच पर भारत की सांस्कृतिक पहचान और सनातन मूल्यों की प्रतिनिधि बनकर उभर रही है। आज जब तकनीक के माध्यम से विश्व एक परिवार बनता जा रहा है, हिंदी की वैश्विक उपस्थिति और भी सशक्त हो रही है।
प्रशांक त्यागी, नरदेव सिंह, सूरज अग्रवाल, दीपक शर्मा, सोनू सिंह, अखिलेश भाटी सहित सभी सम्मानित उपस्थितजनों का स्नेह और समर्थन मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह सम्मान मुझे आगे और अधिक जिम्मेदारी से लिखने, सोचने और राष्ट्रहित में साहित्य साधना करने का संकल्प देता है।
मैं मानता हूँ कि लेखक का दायित्व केवल शब्द रचना तक सीमित नहीं होता; उसे समाज की दिशा और चेतना को भी सकारात्मक ऊर्जा देनी होती है। यदि मेरे लेखन से राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक समरसता की भावना को बल मिला है, तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।
यह सम्मान मेरे लिए विराम नहीं, बल्कि एक नवीन आरंभ है — राष्ट्रभाषा हिंदी और राष्ट्रचेतना के पथ पर निरंतर अग्रसर रहने का संकल्प।
सूचना स्रोत
डॉ अशोक कुमार चौधरी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति
