महाशिवरात्रि
आध्यात्मिकता और विज्ञान के बीच एक सरल सेतु
डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ द्वारा व्यक्त गहन भावों को सरल शब्दों में समझें तो महाशिवरात्रि केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने और अपनी चेतना को ऊँचा उठाने का अवसर है। आइए इसे सहज भाषा में समझते हैं—
‘शिव’ का वैज्ञानिक संकेत क्या है?
दर्शन में ‘शिव’ का अर्थ है – वह जो नहीं है, यानी शून्यता।
विज्ञान भी कहता है कि ब्रह्मांड का अधिकांश भाग खाली है – जिसे हम ‘डार्क मैटर’ या विशाल अंतरिक्ष कहते हैं।
इसका सरल अर्थ यह है कि जैसे सब कुछ शून्य से उत्पन्न होता है और अंत में उसी में विलीन हो जाता है, वैसे ही शिव उस मूल आधार के प्रतीक हैं।
यह हमें सिखाता है कि हम भी उसी विराट चेतना का अंश हैं।
अंधकार क्यों महत्वपूर्ण है?
हम सामान्यतः अंधकार को बुरा मानते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि की रात हमें बताती है कि—
* प्रकाश का एक स्रोत होता है, वह सीमित है।
* अंधकार सर्वत्र है, असीम है।
अर्थात् जब हम शांति और स्थिरता में बैठते हैं, तो मन के विचार धीरे-धीरे शांत होने लगते हैं।
इस रात ‘जागरण’ का मतलब सिर्फ रात भर न जागना नहीं, बल्कि *चेतना को सजग रखना* है यानि

रीढ़ और ऊर्जा का संबंध
योग परंपरा कहती है कि इस विशेष रात्रि में पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि शरीर की ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होने में सहायक होती है।
यदि हम—
* रीढ़ सीधी रखें
* ध्यान या जप करें
तो हमारी आंतरिक ऊर्जा (कुण्डलिनी) के जागरण की संभावना बढ़ती है।
इसे प्रतीकात्मक रूप में पशुवृत्तियों से ऊपर उठकर जागरूक, संयमी और संतुलित बनने की प्रक्रिया कहा गया है।
शिव और शक्ति का अर्थ
शिव चेतना हैं, शक्ति ऊर्जा है।
यदि ऊर्जा को दिशा न मिले तो वह अस्थिर रहती है।
जब चेतना और ऊर्जा संतुलित हो जाते हैं, तभी जीवन में सामंजस्य आता है।
इसी संतुलन को ‘अर्धनारीश्वर’ रूप में दर्शाया गया है—जहाँ पुरुष और प्रकृति एक हो जाते हैं।
उपवास का वास्तविक अर्थ
उपवास का अर्थ केवल भोजन न करना नहीं है।
‘उप’ + ‘वास’ का अर्थ है — *निकट रहना* (स्वयं के निकट)।
इस दिन हम—
* इंद्रियों के आकर्षण से थोड़ा दूर रहें
* आत्मचिंतन करें
* अपने भीतर के दोषों को पहचानें
तो यह पर्व वास्तव में सार्थक हो जाता है।
सरल निष्कर्ष
महाशिवरात्रि हमें यह सिखाती है कि—
* हम केवल शरीर नहीं, चेतना हैं।
* स्थिरता में ही वास्तविक शक्ति है।
* संतुलन ही सृष्टि का नियम है।
* सत्य ही शिव है, और वही सुंदर है।
यह पर्व हमें बाहरी आडंबर से हटाकर भीतर की यात्रा करने का आमंत्रण देता है।
सत्यं शिवं सुंदरम
यह जान लें कि जो सत्य है, वही कल्याणकारी है और वही वास्तविक सौंदर्य भी है।
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