क्यों स्मरण है राम का?

क्यों स्मरण है राम का?

भूमिका

एक आदर्श पुत्र व भाई, हनुमान के लिए स्वामी, प्रजा के लिए नीति-कुशल व न्यायप्रिय राजा, सुग्रीव व केवट के परम मित्र और सेना को साथ लेकर चलने वाले व्यक्तित्व के रूप में भगवान राम को पहचाना जाता है। उनके इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है ।

सो! चहुं ओर राम ही राम

इसलिए ही तो बस राम ही राम है

एक आज्ञा पर जो राज को त्याग दे।

शत्रु हो मित्र हो सबको अनुराग दे।।

चल पड़े पल में वन को महल छोड़कर।

जड़ हो चेतन हो सबको ही जो राग दे।।

कामना से परे पूर्ण निष्काम है।

इसलिए ही तो बस राम ही राम है।।

बेर शबरी के स्नेहपूर्ण खाते गए।

मित्र निषाद को अंक लगाते गए।।

भील वनवासी परिजन से प्यारे जिन्हें।

पांव केवट से भी जो धुलाते गए।।

वो करुणा की मूरत परम धाम हैं।

इसलिए ही तो बस राम ही राम है।।

पितृ सम ही जटायु की अंतिम क्रिया।

मित्र सुग्रीव की पूर्ण की सब प्रक्रिया।।

स्व से बढ़कर जो तत्पर है पर के लिये।

मित्र का कार्य पहले बाद में थी सिया।।

राजीव लोचन जगत में वो अभिराम है।

इसलिए ही तो बस राम ही राम है ।।

 

भालू वानर को भी जो सुयश दे गए।

बाल अंगद को भी जग में यश दे गए।।

नल हो या नील हो या जामवंत हनु हो।

प्रेम के मोल खुद को बरबस दे गए।।

वो ही पुरुषोत्तम वो ही पूर्णकाम है।

इसलिए ही तो बस राम ही राम है।।

 

शत्रु के ज्ञान का भी जो आदर करे।

भाई को उनके सम्मुख जो सादर करे।।

मुक्त सम्पूर्ण लंका के रजनीचर कर।

तृण मात्र का जो न निरादर करे।।

 

निराकार साकार गुण धाम है ।

इसलिए ही तो बस राम ही राम है ।।

रचनाकार

dAyA shArmA