जीवन की वास्तविक सुंदरता

जीवन की वास्तविक सुंदरता

जीवन की वास्तविक सुंदरता

प्रमिला त्रिवेदी का विचार

जीवन की वास्तविक सुंदरता इस बात में नहीं कि हम कभी गलती न करें, बल्कि इस बात में निहित है कि हम अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस रखें। भूल होना मनुष्य के स्वभाव का सहज अंग है, परंतु उसे स्वीकार कर लेना मनुष्यत्व की सच्ची पहचान है। जब हम अपनी त्रुटियों का सामना ईमानदारी से करते हैं, तब हमारे भीतर विनम्रता का उदय होता है, और यही विनम्रता हमारे व्यक्तित्व को गरिमा, संतुलन और परिपक्वता प्रदान करती है।

गलतियों से बचना जितना महत्वपूर्ण नहीं, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उनसे सीखना। जो व्यक्ति अपनी भूलों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का प्रयास करता है, वह निरंतर आत्म-विकास की दिशा में अग्रसर रहता है। आत्मस्वीकार का यह भाव हमें अहंकार से दूर ले जाकर आत्मबोध की ओर ले जाता है। यह हमें सिखाता है कि पूर्णता का मार्ग त्रुटियों से होकर ही गुजरता है, और हर गलती एक नए अनुभव का द्वार खोलती है।

क्षमा करना देवत्व का गुण माना गया है। जो व्यक्ति दूसरों की भूलों को हृदय की विशालता से क्षमा कर देता है, वह केवल सामने वाले को ही नहीं, स्वयं को भी आंतरिक बंधनों से मुक्त कर लेता है। क्षमा का भाव मन के भीतर जमी कटुता, द्वेष और पीड़ा को शांत करता है तथा हृदय में करुणा, सहानुभूति और अपनत्व का संचार करता है।

वास्तव में क्षमा दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक है। यह उस ऊँचाई का परिचायक है जहाँ मनुष्य प्रतिशोध से ऊपर उठकर संवेदनशीलता को चुनता है। क्षमा हमारे संबंधों में मधुरता लाती है, टूटे हुए विश्वास को पुनः जोड़ती है और जीवन में सौहार्द का वातावरण निर्मित करती है।

जब हम अपनी भूलों को स्वीकार करने की विनम्रता और दूसरों की त्रुटियों को क्षमा करने की उदारता दोनों को अपने जीवन में स्थान देते हैं, तब हमारा व्यक्तित्व अधिक मानवीय, संतुलित और उज्ज्वल बनता है। यही भाव जीवन को सरल, शांत और सार्थक बनाते हैं। अंततः, स्वीकार और क्षमा—ये दोनों गुण मिलकर मनुष्य को केवल अच्छा नहीं, बल्कि महान बनने की दिशा में अग्रसर करते हैं।

विचारक

प्रमिला त्रिवेदी जी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति

शब्दशिल्प
चैट जीपीटी (नवाचार सहायक)
प्रस्तुतकर्ता