अपना दर्द – मुकेश कुमावत ‘मंगल’

अपना दर्द – मुकेश कुमावत ‘मंगल’

भूमिका

आत्ममूल्यांकन में व्यक्ति अपने जीवन, कार्य, और व्यक्तिगत विकास के हर पहलू का ईमानदारी से मूल्यांकन करता है। इसमें अपनी क्षमताओं, कमजोरियों, उपलब्धियों और विफलताओं का विश्लेषण व्यक्ति द्वारा किया जाता है ताकि आत्मविकास की दिशा में सही कदम उठाए जा सकें। आत्ममूल्यांकन में अपने लक्ष्य निर्धारित करना, उन तक पहुंचने की योजना बनाना और समय-समय पर अपने प्रदर्शन का आकलन करना शामिल होता है। यह प्रक्रिया न केवल व्यक्ति को आत्म-जागरूक बनाती है, बल्कि उसे अपनी सीमाओं को पहचानने और उन्हें पार करने का आत्मविश्वास भी प्रदान करती है। आदर्श आत्ममूल्यांकन के लिए ईमानदारी, आत्म-अवलोकन और निरंतर सुधार की भावना आवश्यक होती है जो कवि मुकेश कुमावत में है।

कविता

अपना दर्द

दिल मेरा भी रोता है,

दर्द मुझे भी होता है।

मैं कोई पत्थर का तो हूँ नहीं,

मुझ में भी तो स्वाभिमान है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।१।।

 

मैंने कितना कुछ सहन किया है,

हमेशा सबके दु:खों को वहन किया है।

मैं कोई लकड़ी का तो हूँ नहीं,

मुझ में भी आत्मविश्वास है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।२।।

 

अपनों को अपना हमेशा माना है,

पर अपनों ने मुझे कहां जाना है।

मैं कोई मिट्टी का तो हूँ नहीं,

दिल मेरा अपनों की बाट जोहता है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।३।।

 

कष्ट सहे, किसी पर ना थोपे हैं,

अपनों में नफरत के बीज ना रोपे हैं।

मैं कोई लोहे का तो हूँ नहीं,

मेरा भी अपनों में रहने का मन है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।४।।

 

मैं रहा हूँ, पर किसी को कुछ ना बोला हूँ,

अपने दु:खों को, कभी किसी से ना तोला हूँ।

मैं कोई देवता तो हूँ नहीं,

आखिर कष्ट मुझको भी होता है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।५।।

 

मैंने कर्म की पूजा के अतिरिक्त कुछ न जाना,

दुश्मनों को सदैव अपना ही माना।

मैं कोई असुर तो हूँ नहीं,

मुझ में भी प्रेम का सागर बहता है।।

दिल मेरा भी रोता है ..।।६।।

रचनाकार

मुकेश कुमावत ‘मंगल’

टोंक (राजस्थान)