भूमिका
साथियो नमस्कार!
आज मैं आप सबसे एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहा हूँ जो हम सभी के जीवन का एक हिस्सा है—दर्द। दर्द सिर्फ एक शारीरिक अनुभूति नहीं है, यह हमारी भावनाओं, हमारी यादों और हमारे अनुभवों से गहराई से जुड़ा होता है। यह हमें तोड़ता भी है और कभी-कभी हमें संवारता भी है।
दर्द वह एहसास है जो हमें बताता है कि हम जीवित हैं, कि हम महसूस कर सकते हैं, कि हमारे अंदर संवेदनाएँ हैं। यह केवल शारीरिक नहीं होता, भावनात्मक दर्द भी उतना ही तीव्र और प्रभावशाली हो सकता है। किसी अपने को खोने का दर्द, विफलता का दर्द, या फिर अकेलेपन का दर्द—हर दर्द की अपनी एक कहानी होती है, लेकिन…..
क्या दर्द का कोई अर्थ भी होता है? क्या यह हमें कुछ सिखाने के लिए आता है? क्या यह हमें मजबूत बनाता है या हमें कमजोर करता है?
यह सब ही आज आप आगे दी कविता से समझ पाएंगे, और शायद इस दर्द में भी कोई गहरी सीख छिपी हो, जिसे हम अब तक नहीं समझ पाए।
आइए, इस मेरे साथ हम प्रस्तुत कविता के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं कि दर्द सिर्फ एक तकलीफ नहीं, बल्कि एक सबक है।
।। दर्द से संवाद।।
दर्द ने एक दिन आकर मुझसे कहा,
कि मैंने सबको रुलाया है,
मैंने सबको अधर में झुलाया है ।
मैंने सबको उनकी औकात दिखाई है,
मैंने सबको उनके जमीर से मिलाया है।
पर तुम किस चीज के बने हो यार,
ना मैं तुम्हें झुका पाया,
ना मैं कभी रोक पाया,
ना तुम्हें कभी रोते देखा,
ना तुम्हें कभी सोते देखा,
आखिर तुम्हारी स्थिरता का राज क्या है,
मैंने कहा,
मैं कम खाता हूँ, गम खाता हूँ,
जल्दी उठता हूँ, जल्दी सोता हूँ,
छोटी छोटी बातों पर कभी नहीं रोता हूँ,
समय को समझता हूँ और अपनों में रहता हूँ,
किताबों में दुनिया है, दुनिया की किताबें पढ़ता हूँ,
मन को मस्त, तन को स्वस्थ रखता हूँ,
हर श्वास-श्वास में राम नाम मैं भजता हूँ।
इतना सुनकर दर्द ने कहा कि
तुम धन्य हो मेरे भाई,
तुम ही हो मानव जीवन के सच्चे राही।।
रचयिता
मुकेश कुमावत मंगल टोंक।