हिस्सा
कोर्टरूम में बहन की आवाज़ गूंज रही थी—
“मेरे बाप की ज़मीन है, मेरा भी हिस्सा है!”
वह गुस्से में कांप रही थी। सामने भाई हथकड़ी लगे हाथों के साथ खड़ा था, जैसे उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। चेहरे पर बेबसी थी, आँखों में सवाल। क्या वाकई वह चोर था? क्या बहन सही कह रही थी?
वह अतीत में खो गया…
बीते दिन
छोटी-सी झोपड़ी। दरवाजे पर भिखारी खड़ा था। भाई अंदर से दरवाजा धीरे से बंद कर देता। खाली झोली में देने के लिए कुछ था ही नहीं।
बच्चे नए कपड़ों की ज़िद में रोते-रोते सो जाते। पर वह लाता कहां से? खेत के चंद टुकड़े थे, जिनकी फसल चंद सिक्कों में बिक जाती। उन सिक्कों से पहले कपड़ों की उधारी चुकानी पड़ती, फिर चावल खरीदना पड़ता। अगर कुछ बचता तो वह सुनार की दुकान पर गिरवी पड़े गहनों की कीमत चुका देता, जो बहन की शादी के लिए रखे थे।
फिर भी उधारी खत्म नहीं होती। पंसारी की दुकान, बनिए की बहियों में नाम बढ़ता गया, लेकिन घर का चूल्हा ठंडा ही रहा। शादी-ब्याह, नुक्ते, मायरे, जामणे सब होते रहे, लेकिन भाई… वह धीरे-धीरे खुद को खोता चला गया। उसकी हड्डियों का ढांचा बचा था, उम्मीदें नहीं।
लेकिन वक़्त बदला। मेहनत रंग लाई। फसलें अच्छी होने लगीं। थोड़ा पैसा हाथ आया। तब बहन को याद आया—
“अरे! मेरा भी तो हिस्सा है!”
आज
कोर्ट में बहन ने वकील की ओर देखा—
“साफ बात है, जज साहब! मेरे बाप की ज़मीन है, मुझे मेरा हक़ चाहिए!”
जज ने भाई की ओर देखा—
“तुम्हें कुछ कहना है?”
भाई कुछ पल चुप रहा, फिर धीमी आवाज़ में बोला—
“गरीबी में हिस्सा कौन लेगा, जज साहब? कर्जे में हिस्सा कौन लेगा? जब ये खेत बोझ थे, तब ये मेरा हिस्सा नहीं था। जब मुझे भूखा सोना पड़ता था, तब यह हिस्सा नहीं था। अब जब थोड़ा संभल गया, तो मुझे चोर बना दिया गया?”
कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया।
जज ने दस्तावेज़ों पर नजर डाली। फैसला सुना दिया—
“भाई ने बहन का हिस्सा खा लिया। वह दोषी है।”
भाई चुप था। जैसे भीतर ही भीतर टूट गया हो। हथकड़ी के बोझ से ज्यादा उसे इस फैसले ने तोड़ दिया था।
रचनाकार
श्री दयाशंकर शर्मा
उच्चीकृत
चैट जीपीटी की सहायता से