नशा
दिसंबर की वो मनहूस रात अपने साथ अज़ीब-सी खामोशी लिए हुए थी। महीबा का मन बेचैन था, किसी अनहोनी की दस्तक से!!
उसके कमरे में अचानक बाहर से एक चमगादड़ घुस आया था। उसने सुना था, चमगादड़ का यूं घर में आना अशुभ होता है। महीबा के दिल और दिमाग में द्वंद्व का तूफान-सा मच गया। वो न चाहते हुए भी अपने आपको इस अंधविश्वास पर विश्वास करने से रोक नहीं पा रही थी कि कुछ अशुभ होने वाला है।
जैसे-तैसे उस चमगादड़ को बाहर निकालने के बाद स्वयं को दिलासा दे पाई लेकिन पूरी रात बेचैनी में गुजरी। सुबह-सुबह उसके फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाया तो फोन घर से था! फोन में अना जोर-जोर से रो रही थी। “चाची सब खत्म हो गया…!”
“क्या बेटा? क्या हुआ?” महीबा ने हैरत से पूछा!
“चाची वो….. वो… अजहर चला गया…..”, अना ने कहा!
“ओह्ह!! कब? कैसे?” महीबा बोली!
महीबा जान चुकी थी कि अजहर, जो पिछले कई महीनों से बीमार था, अब नहीं रहा..!!
महीबा ने कहा- “हम अभी आते हैं अना, तुम रोना नहीं।”
महीबा पास के दूसरे मोहल्ले में अपने नये घर में हाल ही में शिफ्ट हुई थी।
अभी लगभग पंद्रह वर्ष पहले की ही तो बात है जब अजहर महीबा की शादी के दूसरे दिन अपने सिर पर सेहरा बाँधने के लिए खूब रोया था।
उसकी जिद थी कि उसे भी सेहरा बाँधना है, जैसा उसके चाचा आफताब ने बांधा हुआ था।
फिर क्या था उसके पापा अफरोज़ ने उसके लिए स्पेशल छोटा-सा सेहरा बनवाया जिसे वह पूरे दिन घर में अपने सिर पर बांधे हुए घूमता रहा।
अगली सुबह घर के सभी बच्चों के साथ अपनी चाची को घेर कर बैठ गया और पूरी बीस तक की टेबल बिना रुके सुना कर अपनी मंडली का सुपर स्टार बन बैठा। अपनी राइटिंग कॉपी भी बड़ी ख़ुशी से दिखाने लाया। कमाल का लिखता था, जैसे कॉपी में छाप रहा हो। क्रिकेट का जुनून इस कदर कि बड़े होकर तो इंडिया टीम का कैप्टन ही बनना था अज़हर को।
उसकी जीती हुई मैन ऑफ द मैच की ट्राफी जैसे महीबा की आँखों के आगे एक के बाद एक आए जा रही थी।
उसी ने तो बताया था, “जब उसकी टीम हारने लगती है तो वह जहां भी हो, उसके दोस्त ढूंढ निकालते हैं और मैच जीत जाते हैं।”
महीबा के बहते आँसुओं में गुस्सा भी था और सवाल भी कि आखिर क्यों उसकी नशे की आदत को छुड़ाने के लिए समय पर वाजिब प्रयास नहीं किए गए?
कैसे शराब और जुए की लत ने एक होनहार लड़के का जीवन वक़्त से पहले समाप्त कर दिया? अगर समय रहते उस पर ध्यान दिया जाता तो शायद वह अभी जिंदा होता….!
आयशा और अफरोज़ के जीवन में सब कुछ था। पेशे से वकील अफरोज़ की दो बेटियां और एक बेटा था जो अपनी माँ आयशा, दादी तबस्सुम तथा दोनों बहनों अना और शना की आँखों का तारा था। बुआ रज़िया तो जान छिड़कती थी उसपर। जो मांगे वो फौरन हाज़िर। रज़िया उसे क्रिकेट का कैप्टन बनाना चाहती थी इसलिए उसका नाम भी अज़हर ही रखा था। रज़िया बुआ सरकारी टीचर थी, वह खूब पैसे लुटाती थी अज़हर पर।
लेकिन सबके प्यार-दुलार से दादी अक्सर परेशान हो जाती और बोल पड़ती, “थोड़ा संभाल ले अपने लाडले को। एक अंडा, कहीं वो भी गंडा न बन जाए।” “सांड न बना! …सांड की बीवी रांड (विधवा) होती है! ध्यान रख मेरी बातों को, बाल यूं ही धूप में सफेद न किए हमने!!”
दादी की बातों को आयशा सिरे से नकार देती और कहती, “चलो हटो! जब देखो तब मेरे अज़हर के पीछे न पड़ा करो आप, माँ।”
दादी कहती, “हमें क्या करना है, मर के चले जाएंगे कुछ दिनों में, तुम झेलना!” कहते हुए खामोश हो जाती।
दादी का कम दुलारा नहीं था अज़हर!
कभी हँसकर कभी गुदगुदा कर अपनी बात मनवा लेता था उनसे। लेकिन बूढ़ी आँखों का तज़ुर्बा उन्हें आगाह करता रहता जिसके कारण वो अपनी बात रख ही देती थी, भले किसी को बुरा लगे।
दादी का भय धीरे-धीरे सामने आने लगा था।
अभी अजहर की उम्र आठ-नौ साल ही थी और दिन भर अपने मुंह में मीठी सुपारी भरे रहता! …और तो और आयशा का उसे मना न करना, बल्कि खुद ही चोरी छिपे उसे सुपारी लाकर देना धीरे-धीरे तम्बाकू वाले गुटखे में कब बदल गया, पता ही न चला।
पिता अफरोज़ से छिपा कर खाने वाला गुटका कभी-कभी अफ़रोज के देखने के बाद भी अजहर के मुंह में भरा रहता। अफरोज़ ने भी बेटे को कम ही डांटा। अक्सर उसकी गलतियां नज़रअंदाज़ कर देता।
अज़हर पढ़ने में बहुत होशियार था लेकिन स्कूल जाने के नाम पर अक्सर उसके पेट में दर्द उठ जाता, जो स्कूल का समय समाप्त होने पर खुद-ब-खुद ठीक हो जाता।
अफरोज़ भी स्कूल जाने के पक्ष में नहीं था। उसने घर पर ही तीन-चार ट्यूशन लगवा दिए।
अब अज़हर को स्कूल केवल परीक्षा देने ही जाना होता था। लेकिन अज़हर का पेट दर्द अब ट्यूशन में भी शुरू हो गया। अब ट्यूशन से भी वह गायब होने लगा जिसका पता अफरोज़ को कम ही होता, लेकिन जब पता चलता तो आयशा पर खूब बरसता।
आयशा का प्यार अक्सर ढाल बन जाता अज़हर की। अब उसका मन अपनी उम्र से बड़े बच्चों के साथ ज्यादा और पढ़ाई में कम लगता।
एक दिन आयशा की देवरानी सूफिया ने कहा, “भाभी देखो, तुम्हारा अज़हर बिगड़ रहा है। मुझसे कई लोगों ने बताया है कि वह गली के नुक्कड़ पर सिगरेट पी रहा था और शराब भी पी रखी थी। वह जिन लोगों के साथ रहता है वो बड़े-बड़े जुआ खेलते-खेलाते हैं।”
इतना सुनते ही आयशा गुस्से से लाल हो गई और सीधे अपनी सासू माँ के पास पहुंच गई, सूफिया की शिकायत लेकर। “देखो माँ!! ये लोग मेरे बेटे को बदनाम कर रहे हैं, अगर उसके पापा को पता चलेगा तो कितना गुस्सा होंगे?”
“आप मना कर लीजिये सूफिया को, ये अपना मुंह बंद रखे”, कहते हुए अज़हर को लेकर अपने घर चली गई।
शायद यह आयशा की वो गलती थी जिसने अज़हर को अच्छे-बुरे में भेद करना फिर कभी सीखने न दिया।
अब तो आए दिन अज़हर की शिकायतें आने लगीं, कभी किसी दोस्त से तो कभी किसी पड़ोसी से!!
लेकिन ममता की पट्टी आयशा ने इतनी सख्त बांध रखी थी कि उसे न कुछ दिखाई देता न सुनाई।
वो बस वही देखती जो अज़हर उससे कहता।
वक़्त गुजरता गया, जो बात पिता से छुपी थी अब बाहर के लोगों से पता चलने लगी। कभी-कभी ऑफिस से आने के बाद थोड़ा डांट-डपट लगा देते और संतोष कर लेते कि समस्या एक दिन खुद-ब-खुद ठीक हो जाएगी। अक्सर अज़हर की शादी की बात करते। उनका मानना था कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।
एक दिन शराब के नशे में अज़हर पास की साइकिल की दुकान में बदहवास पड़ा था। उसके एक साथी ने घर में खबर की। आयशा जिस बात को सबसे छिपा रही थी, वह अब पूरे घर के सामने थी।
अज़हर नशे में था, आयशा ने उसे अपने कंधे से सहारा दिया तो उसके पैर लड़खड़ाने लगे, तभी जल्दी से दूसरा कंधा सूफिया ने लगा दिया और उसे घर लाकर लिटा दिया।
होश संभालने के बाद आयशा ने अजहर को कई थप्पड़ लगाए और खुद भी खूब रोई। अजहर ने माफ़ी मांगकर बात खत्म कर दी कि आगे से ऐसा न होगा। लेकिन ये सिलसिला जारी रहा। अब रोज़ जुआ खेलता फिर कभी जीत की खुशी में कभी हार के गम में शराब पीता।
जब जुआ हार जाता तो आयशा खूब डांट लगाती लेकिन जीतने में किसी को कानोंकान खबर न हो, इसकी पूरी कोशिश करती।
कुछ दिन पहले की ही तो बात थी जब आयशा फूली न समा रही थी कि ‘बस, अब उसका बेटा जुआ नहीं खेलेगा’ क्योंकि उसने ‘एक लाख रुपए जीत लिए थे।’
उस एक लाख में दोनों बहनों और माँ ने हिस्सा भी लिया था। अफरोज के लिए भी तो ढेर सारे फल लेकर आया था अज़हर।
तब किसी को उसमें कमी नज़र न आ रही थी लेकिन जब पैसे खत्म हो गए और अज़हर जुए में फिर हारने लगा। डेढ़ लाख का कर्ज़ हो गया! कहीं से पैसे न मिल पाने के तनाव और शराब के नशे में अपनी बड़ी बहन सना की सोने की चेन चोरी करके बेच आया, तब तो सबने मिल कर उसकी पिटाई की लेकिन अब इस पिटाई से कोई फायदा न था। शायद अब बहुत देर हो चुकी थी!!
अब वह कभी शराब के नशे में नाली में लेटा मिलता, कभी तपती सड़क पर बदहवास पड़ा।
अफरोज़ ने अजहर की शादी कर दी जबकि अभी वह केवल 17 वर्ष का था। उसका मानना था कि शादी के बाद उसकी आदत में सुधार आ जाएगा।
शादी के बाद उसे मेडिटेशन सेंटर भेजने की तैयारी की गई लेकिन कोई न कोई बहाना बनाकर वो रुक जाता।
शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला बल्कि अब घर से पैसे न मिलने पर घर का सामान चोरी करके शराब पीना शुरू कर दिया।
जुआ जीत जाता तो सिकंदर बन जाता, नहीं तो माँ और पापा से हज़ार बहाने से पैसे ले ही लेता।
साल भर के अंदर उसके घर एक बेटी का जन्म हुआ लेकिन तब भी उसमें सुधार न हुआ।
दो साल के भीतर बीवी ने खुद ही उम्मीद छोड़ अज़हर को तलाक दे दिया।
धीरे-धीरे अजहर पर बरसता सारा दुलार, गालियों और तानों में तब्दील हो गया। माँ, दादी, बहनें, बुआ यहां तक कि पिता भी कोसते।
धीरे-धीरे जुए की आदत छूट गई थी क्योंकि शराब पीने के कारण होश में कम ही रहता था अज़हर। जब देखो, नशे में पड़ा रहता। अब वह पहले जैसा स्मार्ट गोरा-चिट्टा नहीं रहा था। अब तो उसका शरीर काला-सा पड़ता जा रहा था। बस अपनी बेटी को अक्सर देखने जाता तब शराब न पीता, बहुत प्यार करता था उसे। उसकी बीवी ने अब दूसरी शादी कर ली थी। बेटी की परवरिश नानी कर रही थी। बहुत आरज़ू-मिन्नत करने पर भी बेटी नहीं दी थी उसकी बीवी ने।
अज़हर अपनी बुरी आदतों की वजह से अक्सर नज़रें चुरा कर निकल जाया करता था। महिबा अज़हर की छोटी चाची थी, उसको ठीक से किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता था। एक दिन अपनेआप ही उसके पास पहुंचता है और कहता है, “चाची मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”
महीबा ने कहा, “बोलो क्या बोलना है?” महिबा अपना सामान पैक कर रही थी, अपने नये घर में शिफ्ट होने के लिए।
“चाची मेरे मुंह में एक जख्म-सा हो गया है जो ठीक नहीं हो रहा।” अज़हर बोला!!
पहली बार था जब अज़हर बड़े होने के बाद अपनी कोई बात शेयर कर रहा था महीबा से, शायद अब उसके दर्द को कोई और नहीं समझ रहा था। वह अब बिल्कुल अकेला था!!
अब उसका शरीर भी टूटता जा रहा था लेकिन शराब बराबर पिये जा रहा था। उसके मुंह में जख्म हो गया था जिसका इलाज कराना उसके घर वाले पैसों की बर्बादी समझते थे। बहुत कहने पर उसे पास के एक सरकारी हॉस्पिटल में दिखाने गये, सरकारी हॉस्पिटल से दी गई दवाओं से कुछ खास आराम न लगा। उसके चेहरे में सूजन लगातार बढ़ रही थी। उसका होंठ नीचे की ओर लटकता जा रहा था। चेहरा भी बहुत भयावह लगने लगा था। कभी अपने आप सूजन उतर जाती, कभी फिर आ जाती। घर वाले अब उसकी बीमारी से तंग आ गए थे।
अभी मुश्किल से 21-22 वर्ष का ही होगा अज़हर लेकिन शरीर एकदम निढाल हो चुका था। शराब न चाहते हुए भी अपने पास उसे बुला लेती, अब तो घर के पास ही शराब का ठेका भी खुल गया था।
एक दिन उसके आधे शरीर पर चटक बैगनी रंग के चोट के कई निशान दिखे। उसे याद नहीं था ये निशान कैसे बने? कोई चोट है या किसी ने उसे पीटा है?
होश आया तो बेहद दर्द था उसे। महीबा के पास वह दर्द की दवा लेने आया। महीबा का मन उसे देख कर कराह उठा।
चौंकते हुए महीबा ने पूछा, “क्या भाभी को दिखाया? क्या हुआ तुम्हें अज़हर?”
अब अजहर अक्सर महीबा के पास कुछ मन हल्का करने आ जाया करता, जैसे पहले आया करता था, बचपन में जब वो उसकी चाची बन कर आई थी।
बहुत दवा लगाने के बाद भी उसकी ये चोट पूरी तरह ठीक न हो पाती। कुछ हल्का-सा भी छू जाता तो उसके शरीर पर नीला धब्बा पड़ जाता, फिर बहुत दर्द होता। शरीर के जख्म और दर्द से शरीर फूल-सा गया था।
महीबा ने कहा, “अज़हर, आखिर ये शराब छोड़ क्यों नहीं देते बेटा?”
अज़हर ने जवाब दिया, “चाची इनमें इतना दर्द रहता है कि कोई दर्द की दवा काम नहीं करती इसलिए अब शराब मेरी दवा बन गई है!”
“मैं इसे चाह कर भी नहीं छोड़ सकता। अब लगता है मेरी जिंदगी पूरी हो गई है।” बोलते हुए उसकी आँखों में आँसू आ गए।
बूढ़े माँ-बाप ने कितने सपने देखे थे? अब सब खत्म हो रहे थे!
माँ-बाप, बहनें सभी जैसे उसके पास तक बैठना पसंद नहीं करते थे। खाना, शराब सब उसके कमरे में पहुंचा कर अपने को अलग कर लेते थे।
उसके शरीर की पीड़ा किसी से देखी न जा रही थी। अब तो उसमें इतनी भी शक्ति न थी कि खुद से एक गिलास पानी भी ले सके।
उस रात जोर-जोर से चिल्ला रहा था अपनी माँ और बहन को, पानी देने के लिए!!
अम्मी ओ अम्मी!!
अना ओ अना, कोई तो सुनो!! पापा पानी दे दो! कोई पानी दे दो,,,,,!
बार-बार चिल्लाता रहा लेकिन रोज की तरह सबने सुन कर भी अनसुना कर दिया।
अना को सबसे ज्यादा मलाल इसी बात का था। वो फूट-फूट कर रो रही थी कि “महीबा चाची, मैंने अपने भाई की आखिरी पुकार” आखिर क्यों न सुनी??
जब वो प्यासा था और पानी मांग रहा था। वो अक्सर चिल्लाता था, मुझे लगा रोज़ की तरह ही चिल्ला रहा है लेकिन सुबह देखा तो अज़हर दीवार से टिका हुआ था। उसका इंतकाल हो चुका था।
रचयिता
डॉक्टर नाज परवीन