भूमिका
यह जो विवरण यहां पर दिया जा रहा है वह कोई प्रशस्ति ना होकर एक अभियान ‘गुर्जर महोत्सव’ का मूलतः विश्लेषण है। और! इस अभियान के सृजक गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट के कार्यक्रमों की अनवरत श्रृंखला को जानने और समझाने का एक प्रयास। इसके लिए विश्लेषण की समग्र आख्या प्रस्तुत कर देने के लिए श्री राजपाल कसाना जी का आभार।
समीक्षा
बहुत चिंतन-मनन और सोच-विचार के बाद भी मन की एक गुत्थी सुलझ नहीं पा रही थी कि कृत्रिम बौद्धिकता (ए.आई.) के विकसित होने के दौर में और क्रांतिकारी युग में भी समाज में गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट आहूत गुर्जर महोत्सव और उससे जुड़े आयोजनों में जनमानस इतनी आत्मीयता से भागीदारी किस उद्देश्य और प्रायोजन से करता है? विगत तीन वर्षों से सूरजकुंड में जन सैलाब उमड़ता है और आत्मनियंत्रित स्वःअनुशासित और अपनी मर्यादा गरिमा में रहता है कि किसी बाह्य व्यवस्था की जरूरत ही नहीं पड़ती और उस ऐतिहासिक पल की पुनरावृत्ति सी होती दिखती है जब मेरठ में हुए १८५७ के विद्रोह में बेहद अनुशासित तरीके से दस हजार से भी अधिक आम लोगों को कोतवाल धन सिंह ने नेतृत्व प्रदान किया था। सूरजकुंड का गुर्जर महोत्सव कोई धार्मिक या किसी ईष्ट अभीष्ट देव की पूजा अर्चना का मेला नहीं है कि धार्मिक आस्था या ईष्टदेव की शक्ति आपको वहां अनुशासित या मर्यादित करती है। वह तो विशुद्ध मेला था विभिन्न विचारों, मान्यताओं और आयु वर्ग के सजातीय स्त्री पुरुषों का महासंगम। वहां व्यक्ति जाता भी खुले मन से मौज मस्ती करने ही है लेकिन जो समाज अपने आचार-विचार के लिए, पारस्परिक व्यवहार के लिए दबंग छवि (इमेज) रखता हो, जिस समाज में क्षत्रियत्व का स्वाभिमान उसके सीने की 56 इंची सलवटों को कम होने ही ना देता हो। जिसके युवा वर्ग की चाल-ढाल में, आचार व्यवहार में, बोलचाल में, स्वाभिमान का पारा सदैव ऊपर ही चढ़ा रहता हो। वह समाज और उसके युवा भी महोत्सव में शिष्टता- शालीनता का, स्वतः स्फूर्त अनुशासन का, मान-मर्यादा का यदि पालन करते हैं तो ऐसे में या तो उस पर दूसरे लोगों के लांछन गलत हैं अथवा ऐसा करने वालों की छोटी समझ के प्रतीक हैं। गुर्जर समाज की नैतिकता का, उसकी अस्मिता गरिमा का वह समूह सम्मान है और वह उसके खून में है। गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट समाज के समस्त भागीदारों का आभार ज्ञापित करता है और उम्मीद करता है कि इस स्वतः स्फूर्त अनुशासन को और परस्पर की मान मर्यादा को अपने जीवन में भी अपनाएँ, ताकि दूसरे समाजों की भ्रांत धारणाएं बदल सकें।
विगत तीन वर्षों से कई लाख समाज के स्त्री-पुरुष और बहन-बेटियां या बेटे मेले में भागीदारी करते हैं। मेला तो मेला है वह कोई पूजा या प्रवचन का आयोजन स्थल नहीं है। वहां तो नाच गाने का, खुले मन से खाने पीने का माहौल रहता है, इसलिए प्रायः प्रत्येक भागीदार खुले मन से नाच-गाने सुनता है और देखता भी है और स्वयं करता भी है। कुछ नाच-गाने तो ट्रस्ट द्वारा प्रायोजित होते हैं जिन्हें तैयारी के साथ मंच व्यवस्था में लाया जाता है और कुछ नाच-गाने स्वतंत्र रूप से प्रदर्शित किए जाते हैं। जहां उन्हें अवसर मिला, अपनी टोली बनाई और मस्ती से नाचने लगी, गीत भजन गाने लगी, ढोल-नगाड़े बजने लगे। दर्शक इन सहज नृत्यों को देखकर हतप्रभ रह जाते हैं कि इन अधेड़ महिलाओं में या पुरुषों में कला इतनी उत्कृष्ट है कि पेशेवर कलाकार भी कइयों से पिछड़े दिखाई देते हैं। मंच पर आयोजित कार्यक्रमों की छटा तो देखते ही बनती है, जबकि उनकी भी कोई विधिवत तैयारी नहीं होती। इस महोत्सव में अपनत्व और आत्मीयता का भाव परंपराओं के निर्वाह से ही पैदा होता है। महिलाएं प्रायः पारंपरिक वेशभूषा घाघरा, लहंगा, ओढ़ना, कमीज और परंपरागत आभूषण जैसे मोहरों का हार, हंसली, तोड़ा आदि पहनकर आती हैं। अब यह पहनावा क्योंकि चलन से बाहर है तो इस पहनावे में हमें अपने पूर्वजों की सभ्यता संस्कृति का एहसास होता है और एक अलग प्रकार के गौरव की आनंदानुभूति होती है। दूसरे उस पहनावे को पहनते ही एक भारी-भरकम मर्यादित संस्कारित स्त्री का व्यक्तित्व नजरों के सामने उभरने लगता है। निश्चित ही हमारी महिलाओं का डील-डौल, नाक-नक्श और शारीरिक स्वास्थ्य पूर्णतः शुद्ध आर्य नस्ल का है, जो उनके व्यक्तित्व में एक सहज लावण्य और सौंदर्य स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। पुरुषों के सिर पर प्रायः तुर्रेदार पगड़ी सजी रहती है। पगड़ी से व्यक्ति की शान में एक विशिष्ट गरिमा आ जाती है। नई उम्र के लड़के भी पगड़ी पहनकर अपनी शान से साक्षात्कार करने का कोई अवसर नहीं चूकते। मुझे यह स्वीकारने में गर्व हो रहा है कि कुछ हमारी महिलाओं का स्वाभाविक सौंदर्य तो बॉलीवुड के ग्लैमर को भी पीछे छोड़ देता है। पुरुष वर्ग में भी सहज सुंदरता बंबइया अदाकारों से ज्यादा आकर्षक लगती है।
गुर्जर महोत्सव में जो भागीदारी रहती है वह विशेष प्रयासों से वहां नहीं लाई जाती। स्वतः सब अपने साधनों से आते हैं। गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट की टीम को भागीदारी के लिए निमंत्रण नहीं देने पड़ते। आजकल बस सोशल मीडिया पर महोत्सव की तारीख और समय वायरल किया जाता है और भागीदार अपना समय प्रबंधन स्वयं कर लेते हैं। महीने भर पहले से ही चर्चा करने लगते हैं, प्रोग्राम बनाने लगते हैं, अपना ग्रुप बना लेते हैं। अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग परेशान हैं कि हम उद्देश्य के साथ बुलाते हैं, प्रयास करते हैं, साधन भी देते हैं और लोग हजारों में भी नहीं आते और इस महोत्सव में तो लाखों की संख्या में आते हैं और तीन दिन पूरे समय के लिए आते हैं। आखिर क्यों? जबकि महोत्सव किसी विशेष लक्ष्य की कार्य योजना के साथ ना बनता है और न ही वहां ऐसा कोई प्रयास किया जाता है। हां! इतिहास गैलरी में हमारे समृद्ध इतिहास की झलक हमें गौरवांवित करती है। समाज के कुछ रचनाकारों जैसे राजेश दल्लूपुरा, उदित बैसला, रचना भाटी आदि की कला गैलरियां समाज के कलात्मक कौशल से साक्षात्कार कराती हैं। गुर्जर एजुकेशन वेलफेयर ट्रस्ट, ग्राम पाठशाला, दहेज निवारण समिति, इतिहास की पुस्तक के स्टॉल और संवाद जैसे मंच सार्थक संदेश भी देते हैं लेकिन उनकी ओर ध्यान कम ही जाता है। खाने-पीने के स्टालों पर खूब भीड़ रहती है। निश्चित ही गुर्जर महोत्सव समाज की जीवंतता का, उसके कला प्रेम का और उसके अंदर बैठी संस्कृति की गहन अनुभूति का पर्व है। आज के सेलिब्रिटी जो सौंदर्य को छोटे और तंग कपड़ों में प्रायः अंग-प्रदर्शन में खोजते हैं वे यहा आकर सबक लें कि भरे-पूरे लिबास का सौंदर्य उसकी सेहत सुंदरता का होता है। मैं मुक्त कंठ से इस महोत्सव की प्रशंसा करता हूं और समाज से नित्य जीवन में महोत्सव की जीवंत सामूहिकता, शिष्टता और गरिमा की अपेक्षा करता हूं। इस बार के सूरजकुंड मेले में आर्य कमल सिंह द्वारा एक और अच्छा प्रयास किया गया कि तीनों दिन अखंड रूप से यज्ञ चलता रहा, जिसमें लाखों लोगों ने सहयोग और प्रतिभाग किया। अच्छे संस्कारों की और अपनी संस्कृति की रक्षा की आहुतियां दीं। आर्य जी के इस नूतन प्रयोग के लिए उनको धन्यवाद।
आज विवेकानंद जयंती का युवा दिवस था। मकर संक्रांति मात्र एक दिन बाद 14 जनवरी को है। गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट ने सकरांत का पर्व सेक्टर 75 नोएडा के मून क्लाउड बैंक्विट हाल में आयोजित किया। लगभग पांच सौ लोगों की उत्साहजनक भागीदारी इस कार्यक्रम में रही। पुरुष वर्ग का पहले पगड़ी बांध कर अभिनंदन किया, फिर परंपरा के अनुसार बुजुर्गों को अपनी परंपरागत वेशभूषा में सजी-संवरी सैंकड़ों महिलाएं गीत गाकर समूह नृत्य करके मान सम्मान से मनाकर मंच पर ले गईं। वहां मंच पर बुजुर्गों को एक शॉल एवं एक बेंत देकर सम्मानित किया गया। शिक्षाविद रामफूल सिंह भाटी जी ने सभी महिलाओं को सौ सौ रुपए आशीर्वाद रूप में देखकर पुरुष वर्ग की कृतज्ञता ज्ञापित की, उनका आभार व्यक्त किया। खूब नाच-गाने हुए। महापर्व जैसा खुशनुमा माहौल था। सबने मिलकर आनंदपूर्वक स्वादिष्ट सहभोज किया। इस सांस्कृतिक पर्व के जीवंत आयोजन के लिए परस्पर सबने एक दूसरे को बधाई दी। दिवाकर विधूड़ी और उनकी टीम का आभार व्यक्त किया। महापर्व के आयोजन में मैं कोई कमी नहीं निकल रहा, बस एक सुझाव दे रहा हूं कि हम गांव से निकलकर शहरों में आ गए। जीने के तौर-तरीके बदल गए। जीवन में त्योहारों की गांव जैसी गतिशीलता नहीं रही। नई पीढ़ी उन त्योहारों के सांस्कृतिक महत्व को जानती ही नहीं। बस इतना प्रबंधन और कर लेते कि एक संदेश और दे देते कि सकरांत पर्व प्रकृति में बदलाव का पर्व है। सकरांत से सूर्य उत्तरायण हो जाएगा। गरीबों को, वृद्धों को, बालकों को दांत किटकिटाती सर्दी से राहत मिलने लगेगी। किसान की बोई गई फसलों में फूल आने लगेंगे, बाली निकलने लगेगी, धीरे-धीरे दाना पड़ने लगेगा और नया अनाज नई समृद्धि लेकर किसान की मेहनत का सुफल चुकता करेगा। दूसरे कड़कड़ाती सर्दी में हम बुजुर्गों को शॉल वस्त्र देकर उनका सम्मान प्रकृति के अनुरूप करते हैं। तिल, बाजरा, मूंगफली खाने में प्रयोग कर तन में गर्मी का संचरण करते हैं। एक साथ नाच-गाकर उत्सव भी मनाते हैं और सामाजिक सांस्कृतिक परंपरा को भी जीवंत रखते हैं। पर्व और त्योहार सामाजिक सौहार्द्र के, सहयोग सहिष्णुता के, सुख में भागीदारी के उल्लास पर्व हैं। हजारों मील दूर हमारे बराबर में छठ पूजा, गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा एवं मूर्ति विसर्जन, लोहड़ी, पोंगल जैसे त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं और हम अपने त्योहारों में चुपचाप घर तक सीमित रह जाते हैं। इसलिए बढ़ते शहरीकरण में सकरांति जैसे पर्व सामाजिक भागीदारी के, सामाजिक पहचान के और संस्कृति की रक्षा के पर्व हैं। ऐसे त्योहारों को जीवंत रखो और नई पीढ़ी को संदेश भी दो कि ये पर्व हमारी युगों युगों की पहचान के प्राकृतिक पर्व है।
दरवाजा बंद शहरी जीवन में मेलमिलाप के, सुख-दु:ख की भागीदारी के पर्व हैं, हम सब मिलकर गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट का पुनः धन्यवाद करें और सहयोग का संकल्प लें।
धन्यवाद
राजपाल सिंह कसाना
चित्रदीर्घा