माँ का आठवाँ रूप महा गौरी

माँ का आठवाँ स्वरूप महा गौरी बनीं माँ,
अंग अंग सुगंध, शिव प्रकटाया।
माँ का नवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री बनीं माँ
आधे अंग में शिव के बिराजे हैं माँ।
अर्धनारीश्वर नाम है पाया।
चारभुजा सवारी, सिंह की करती हैं माँ।
रिद्धि सिद्धि पाता जो माँ को ध्याता।
तेज़ स्वरूप हर घर में आया।
हर नारी में अपना तेज़ अंश दिखलाया।
माँ के हैं प्यारे रूप अनेक
सभी पर प्रेम रूप छलकाया
माँ तू सृष्टि सृजन करे,
तू ही दानवों का दलन करे।
दुर्गा तू ही – लक्ष्मी भी तू,
तू ही सरस्वती का स्वरूप है।
कण कण में तू ही समायी है,
कभी छाँव है कभी धूप है।
तेरे रूप अनेक तू एक ही है।
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