मन करता है

मन करता है

भूमिका

कवि की यात्रा सदैव समर्पण और संघर्ष से भरी होती है। वह अपने शब्दों के माध्यम से भावनाओं को पिरोता है, कल्पनाओं को सजीव करता है, और जनमानस के हृदय तक पहुंचने का प्रयास करता है। लेकिन असली चुनौती सिर्फ लिखने में नहीं, बल्कि दुनिया को रोककर सुनने और महसूस करने के लिए प्रेरित करने में है। यह कविता उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण के अथक प्रयासों को दर्शाती है—उसके संघर्ष, उसके सपनों और शब्दों की शक्ति में उसकी अटूट आस्था को। क्या उनकी रचनाएँ जन-जन के मन में गूंजेंगी, या समय के साथ खो जाएंगी? कवि अपने हृदय की गहराइयों को खोलता है, एक अमिट छाप छोड़ने की आशा लिए।

‘मन करता है”

मन करता है गीत सुनाऊँ जो भी मैंने रचे पुराने।

पर तुम सा ना श्रोता कोई लगूँ जिसे मैं गीत सुनाने।

गीतों में तब ही रस आता जब श्रोता हो सुनने वाला।

शब्दों में जो भाव भरे हैं उन भावों को चुनने वाला।

भावों को नगरी में ही तो शब्दों का सृजन होता है।

शब्दों से ही हर जीवन में भावों का नर्तन होता है।

मैं भी शब्दों से भावों की आज चला हूँ रीत निभाने।

पर तुम सा ना श्रोता कोई लगूँ जिसे मैं गीत सुनाने।।१।।

मैं एकाकी होकर बैठा बात करूँ मैं मन की किस से?

खिल जायें जो मन की कलियाँ बात जगत में करके जिस से।

कभी-कभी तो मन ये अपना दो भागों में बंट जाता है।

एक भाग जाता है कहीं पर दूजा यहीं पर डट जाता है।

जो दोनों की करे पूर्ति बैठा हूँ वो मीत बनाने।

पर तुम सा ना श्रोता कोई लगूँ जिसे मैं गीत सुनाने।।२।।

 

कभी-कभी तो अनजाने में अपने ही रूठे दिखते हैं।

लेकिन जब भी हिय टटोलो भाव सभी झूठे मिलते हैं।

देखा कभी खिले उपवन में महक नहीं कोई आती है।

लगता है कोयल भी जैसे मीठी तान नहीं गाती है।

आज चला मैं इस जीवन के अपने रूठे मीत लुभाने।

पर तुम सा ना श्रोता कोई लगूँ जिसे मैं गीत सुनाने।।३।।

गीतों में वो ही आ बसता जो सबसे प्यारा होता है।

उन गीतों में देखा मैंने भाव एक न्यारा होता है।

शब्द कोई मीठे से मेरे अधरों पर आ स्वयं मचलते।

गीतों की रचना हो जाती शब्दों से ही भाव पिघलते।

गीतों का अम्बार लगा है गीत सुनाऊँ किसे रिझाने।

पर तुम सा ना श्रोता कोई लगूँ जिसे मैं गीत सुनाने।।४।।