मेरे कान्हा
कुछ पंक्तियां, कान्हा के लिए।
मोर मुकुट मुरलीधर की
मनभावन, मनमोहन की
मधुर धुन मधुरम- मधुरम
प्रीत शरण है प्रीत झरण है प्रीत ही यमुना घाट
पलकों के पनघट पर बाजे ओस भरी एक रात
भीगे अक्षर बंद पत्र में लिखे तीरथ धाम
कृष्ण कलम से लिखने बैठे राधाजी का नाम
आंखों से बादल बन बरसा गोकुल जैसा धाम
कदम डाल पर झूला डाला, खूब सजी फूलों की माला,
लहर लहर पीताम्बर लहरे, मोर पंख माथे पर फहरे
एक लालसा मन में समाई,
बंसीवट, कालिंदी तट,
मिलूं मैं अपने कृष्ण कन्हाई,
मुरली की तान मनोहर सुन के,
तन मन सकल बिसारूं,
पल पल निहारूं, श्याम सलोना,
उस पर तन मन वा,
अपने कान्हा को रिझाऊं,
डालूं मैं गुंज माल, छवि को निहारूं।
परमानंद हो भूल इस जग को
श्याम श्याम ही पुकारूं,
पुलकित तन मन वारूं,
रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी
प्रस्तुति



