मृत्यु से भय कैसा!

तन है मृत्युलोक का वासी
मन है हर सुख का अभिलाषी
तन को मिट्टी हो जाना है
मन को प्रभु शरण आना है
मिट्टी है ये सारा संसार,
उस कुम्हार का नीत अविष्कार,
उसके सब खेल निराले है
ना जाने कौन सम्भाले है।
कुम्हार की थापी से
कितने रूपों में कुटी-पिटी,
हर बार बिखेरी गई, किंतु
मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी!
मिट्टी की महिमा मिटने में
मिट मिट हर बार सँवरती है
मिट्टी मिट्टी पर मिटती है
मिट्टी मिट्टी को रचती है
कुम्हार घढ़ता नीत चीज नयी,
किसान बोता नीत बीज नये,
सूरज तपता तो तप जाए,
रजनी में शीतल हो जाए।
सृजक

प्रमिला त्रिवेदी
प्रस्तुति

