नई कहानी ‘साहस’

नई कहानी ‘साहस’

साहस

सोफिया बड़े से थैले में लड्डू लिए पूरे मोहल्ले में बाटती घूम रही थी। आज उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

लो सलमा खाला आप भी लो- आज कायनात की पहली सेलरी आई है…!! “बड़े पीर साहब की फ़तेहा कराई थी मैंने” बस उसी के लड्डू हैं….

अच्छा ला बेटा… बड़ी मेहनत रही है तेरी….

मुझे दो लड्डू “आसमा के लिए भी दे जा” वो अभी स्कूल से आती होगी। बड़ी खुश होगी

उसने कायनात अप्पी जैसा मुझे भी काबिल बनना है दिन रात बोल बोल कर मेरे तो कान पकाए रखे हैं।

हाँ! खाला जरूर- ये लीजिये आप उसके दो लड्डू!!

खाला ये लड्डू देशी घी से कायनात के पापा खास बनवा कर लाये हैं…

कौन…..समीर??

समीर कब से इतना समझदार हो गया???

मुझे तो आज भी याद है “तुझे कैसे कैसे उसने तंग किया है।”

कायनात के पैदा होने के पहले कितना पीटा था तुझे…

पूरे शरीर में मेहंदी जैसे लाल सुर्ख उपटे पड़ी हुई थी तेरे,

और वो भी सिर्फ इसलिए की कहीं तेरे फिर से बेटी न हो जाए,,,,

“नौ महीने जीने न दिया था नासपीटे ने!!

ऐसे हुकम दिया करता था जैसे सब तेरे हाथ में हो!!!

फिर क्या था?????

सोफिया का अतीत जैसे उसके सामने से गुजरने लगा…

सोफिया वहीं ठहर मानों खुद को अतीत में मरहम लगाने लगी…

सोफिया खड़े नैन नक्श, गोरे रंग, कमर के नीचे रखे घने मोटे बालों वाली एक बेहद सुंदर लड़की,,,, बी ए फस्ट डिवीजन से पास अपनी माँ की अकेली लड़की थी।

सोफिया की माँ का तलाक हो चुका था इसलिए वही एक मात्र उसका सहारा थी, माँ के एक मकान और कुछ बीघे खेती थी जिससे उसका काम चल जाया करता था।

बेटी सोफिया नौकरी कर माँ का सहारा बनना चाहती थी लेकिन कानपुर के एक छोटे से गाँव में जहाँ पढाई पूरी कराने में उसकी मां को ना जाने कितने तानों का सामना करना पड़ा था नौकरी के लिए हां कहना एक बड़े साहस का काम था। जो शायद उसमें नही था इसलिए उसने कभी हाँ! न भरी।

सोफिया सुंदर थी इसलिए अच्छे रिश्तों की कमी न थी एक बहुत जबरदस्त रिश्ता आया “समीर का!!

लड़का वकालत किये था थोड़ी बहुत खेती भी थी मां ने देखा लड़का पढ़ा लिखा और होनहार है उससे बात करके लगा की लड़का आधुनिक विचारों का है इसलिए रिश्ता पक्का कर दिया।

सोफिया ससुराल चली गयी उसका नौकरी करने का सपना अब सपना ही रह गया।

मां पास ही रहती तो उसका हाल चाल भी सोफिया लिए रहती सब ठीक चल रहा था

तभी सोफिया को खबर हुई की वो मां बनने वाली है सभी बहुत खुश थे दिन बीते और सोफिया ने एक बेटी को जन्म दिया।

समीर ने बेटी की उम्मीद न की थी….

“लेकिन कभी कहा भी नही”….समीर के व्यवहार में हुआ परिवर्तन साफ बयां कर रहा था की उसे बेटे की चाह थी।

सोफिया ने समीर के चेहरे में पढ़ लिया था धीरे धीरे समीर से उसे पता चला की वो बेटा चाहता था खैर दिन गुजरे अभी 9 महीने ही हुए थे की सोफिया फिर से एक बार माँ बनने जा रही थी इस बार समीर ने उसे बता दिया था की उसे बेटा ही चाहिए। आये दिन ताने- बातों के साथ धक्का मुक्की हो जाया करती थी।

सोफिया डरी सहमी सी दुआ कर रही थी की उसे बेटा ही हो लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। इस बार भी उसने एक चाँद सी बेटी को जन्म दिया लेकिन अब समीर ने जैसे एक अलग ही रूप ले लिया था वह अस्पताल में सोफिया को अकेले छोड़ कहीं निकल गया

सोफिया अपनी बेटी को लेकर अपनी सास और माँ के साथ घर आ गयी।

समीर जब वापस आया तो उसके हाथ में एक थैला था जिसमें कुछ जड़ी बूटियां थी।

उसने सोफिया से कहा की ये दवा तुम्हें रोज लेनी है मुझे एक वैध ने दी हैं!! बोला है; अबकी तुम्हारे लड़का होगा….

पर अभी तो मैं.. मैं पूरी तरह संभली भी नहीं… ये कड़वी जड़ी बूटियां कैसे खाऊँगी.. सोफिया ने सवाल किया??

कैसे मतलब जैसे दो-दो बेटी को जना है वैसे ही ,”मेरी तो किस्मत ही फूट गयी तुमसे शादी करके”” जिसके न खुद कोई भाई था!!और न अब बेटा ही दे पा रही…

सोफिया खामोशी से उसके तानों के तीर सहन कर रही थी और रोये जा रही थी।

मैंने थोड़ी कहा था- की मुझसे शादी कर लो???…

सोफिया धीरे से बोली..

मुझसे जुबान लड़ाती है कम्बख़्त औरत!!”जहन्नुम में जायेगी…””

जहन्नुम कैसा?? अल्लाह को तो बेटियां बहुत पसंद हैं आपको नहीं पता??…

जिनके घर बेटी होती है खुदा के फ़रिश्ते सुबह शाम नेकियाँ लेकर आते हैं। अल्लाह जिससे खुश होता है उसे ही बेटी देता है। हमारे नबी पाक बेटियों से कितनी मोहब्बत करते थे आपको नहीं पता???

कहते हुए सोफिया उन जड़ी बूटियों को देखने लगी…

कैसे खाना है इन्हें??बोलते हुए- जैसे अपने नये मिशन पर लग गयी।

वक़्त गुजरता गया समीर के तानों और गुस्से के बीच दोनों बेटियां बड़ी होने लगी शादी के अभी 5 साल भी पूरे न हुए थे की सोफिया फिर माँ बनने वाली थी…

समीर सुनो! अबकी बेटा होने के बाद हम आगे बच्चे न करेंगे इन्हें ही पढायेंगे सोफिया का समीर को सुझाव था!!

लेकिन हमेशा की तरह समीर उसे अनसुना करके चला गया।

ऐसा नहीं था की समीर को अपनी बेटियों से प्यार नहीं था बस बेटे की चाह उसे बेटियों की तरफ आकर्षित ही न कर पा रही थी।

अबकी बार पूरे नौ माह खूब रोजे नमाज में दुआओं के साथ कई तवीज़ भी बांध रखे थे सोफिया ने;

पूरा वक़्त और जान हलक में!!….न जाने अबकी क्या होगा??…..

खुदा जो चाहता है वही होता है और जो होता है अच्छा ही होता है!!

सोचकर सोफिया हॉस्पिटल जाने की तैयारी करने लगी उसके लेबर पेन स्टार्ट हो चुका था..

कुछ ही देर बाद सोफिया ने फिर एक बेटी को जन्म दिया..

“बेटी बड़ी सुंदर थी”

इस बार समीर जैसे किस्मत के आगे हार गया था- उसने बेटी को गोद में लिया और सोफिया से कहा- “लगता है बेटा हमारी किस्मत में नहीं; बेटी फिर आ गयी…..

बेटी होना कुदरत का नायाब तोहफा होता है! खुदा की नेमत हैं बेटियां!!

यही सोच सोफिया ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

वक़्त गुजरा लेकिन समीर की बेटे की चाह कम न हुई यहाँ सोफिया का शरीर अब थकने लगा था

उसे तीनों बेटियों को खूब पढ़ाना है और अपने पैरों खड़ा करना हैं यही सपने को बुनने की शुरुआत वह कर चुकी थी

तीनों बेटियां स्कूल जाने लगी। पढ़ने में तीनों आगे थी।

फिर सोफिया को पता चला की वो फिर से माँ बनने वाली है बेटे की चाह फिर डर और समीर के ताने जैसे सोफिया को अंदर से खाली किये दे रहे थे।

काश कोई जादू हो जाए!! और इस बार बेटा हो जाए…

इसी सोच में सोफिया के दिन गुजर रहे थे।

आखिरकार वो इम्तेहान की घडी फिर आ गयी। लेकिन इस बार सोफिया ने बेटे को जन्म दिया।

“समीर की खुशी का कोई ठिकाना न रहा”…

और सोफिया फाइनल जीतने वाले किसी खिलाडी की तरह थक चुकी थी।

बेटे को समीर अपने जैसा बनायेगा वो सारी खुशियाँ देगा जो उसे न मिल पायी यही सोच सोच कर खुशी में झूमा जा रहा था।

धीरे-धीरे समय आगे बढ़ा वक़्त गुजरता गया और बच्चे बड़े होते गए। बेटे को बेइंतेहा प्यार और दुलार ने जिद्दी बना दिया समीर उसकी हर जिद पूरी करता। बड़ी बेटी ने बीटीसी की ट्रेनिंग कर ली और दूसरी ने एम ए में एडमिशन ले लिया।

वक़्त बदला लेकिन सोच बदलने में वक़्त लगता है शायद इसीलिए दोनों बेटियों की शादी की चर्चाएं परिवार में होने लगी।

इसी बीच छोटी बेटी ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय से बीटेक करने की ख्वाहिश जाहिर की…

माँ सोफिया ने इंटरेंस फॉर्म फिल करा दिया जैसे ही समीर को पता चला वह बहुत नाराज हुआ हमारे पूरे गाँव में कोई भी अकेली लड़की इतना दूर पढ़ने न गयी जो पढ़ना है यही पढ़ो!!कह कर-“सबको शांत करा दिया”

लेकिन सोफिया को अपना सपना जीना था अब ये उसके पास आखिरी मौका था उसने पूरे साहस के साथ समीर के सामने अपनी बात रखी;

और बेटी का दाखला अलीगढ़ में करा दिया।

बेटी भी पढ़ने में बहुत होशियार थी बीटेक अच्छे नंबरों से पास कर लिया।

यहाँ समीर का बेटा लाड़-दुलार में कुछ ज्यादा ही बिगड़ गया और पढाई में नदारत।

समीर को समझ आने लगा था की यह उसकी बुढापे की लाठी नही बनेगा इसलिए अब उसे अपने फैसले पर मन ही मन पछतावा होने लगा था।

लेकिन किसी से कह नही सकता था।

सोफिया की बेटी ने अब गेट का इम्तेहान पास कर पूरे गाँव का नाम रौशन कर दिया था।

सभी उसकी कामयाबी के लिए समीर को बधाई दे रहे थे और बेटा अपने दोस्तों के साथ गप्प लड़ा रहा था।

कुछ दिनों बाद सोफिया की बेटी की बहुत बड़ी कंपनी में जॉब लगती है। जिसका भारी भरकम सेलरी पैकिज होता है।

समीर को जब पता चलता है तो वह फूला नहीं समाता और सोफिया को गले लगा लेता है।

सोफिया जैसे अपने सारे दुःखों को भूल जाती है और खुदा का शुक्र अदा कर सबको लड्डू बाँटने निकल पड़ती है..

“अपने अतीत में डूबी सोफिया को अचानक कोई आवाज देता है!!!

सोफिया सोफिया…

वह पलट कर देखती है- तो समीर होता है जो अखबार लिए तेज दौड़ा चला आ रहा होता है देखो-

सोफिया हमारी कायनात की फोटो निकली है इस अखबार में!!और मेरा और तुम्हारा नाम भी…

सोफिया की आँखों में खुशी के आँसू निकल पड़ते हैं। इतने में सलमा खाला की बेटी आसमा भी आ जाती है और चिल्लाती हुई मुझे भी देखना है…मुझे भी देखना है….

कायनात अप्पी की फोटो दिखाईये न !!!

और अखबार पढ़ने लगती है।

सलमा खाला कहती है- सोफिया अबकी इसका भी दाखिला अलीगढ़ में करा देना।

मुझे भी इसे पहले अपने पैरों खड़ा करना है बाकी सब बाद में… सोफिया मुस्कुराते हुए समीर के साथ घर को चल देती है…।

रचनाकार

डॉ. नाज़ परवीन