एकांकी ‘नशा’
पात्र
महिबा – संवेदनशील, समझदार महिला।
अज़हर – नशे की लत का शिकार युवक।
अना – अज़हर की बहन।
आयशा – अज़हर की माँ।
अफरोज़ – अज़हर के पिता।
दादी तबस्सुम – अनुभवी, व्यावहारिक बुजुर्ग।
सूफिया – परिवार की बहू।
रज़िया बुआ – अज़हर की बुआ।
दृश्य एक: अशुभ संकेत
(दिसंबर माह की सर्द रात। महिबा अपने कमरे में बैठी किसी अनहोनी की आशंका से बेचैन है। अचानक एक चमगादड़ खिड़की से भीतर आता है। महिबा डर जाती है, उसे भगाने की कोशिश करती है। अंततः वह बाहर उड़ जाता है, लेकिन महिबा का मन अशांत रहता है। वह बुदबुदाती है—)
महिबा (स्वयं से) – “यह क्या अशुभ संकेत था? क्या कुछ अनहोनी होने वाली है? नहीं… मुझे वहम हो रहा है।”
(सुबह होते ही फोन की घंटी बजती है।)
महिबा (फोन उठाते हुए) – “हाँ, कौन?”
अना (फोन पर रोते हुए) : “चाची… सब खत्म हो गया!!”
महिबा (चौंककर) – “क्या हुआ, अना?”
अना – “भैया… अज़हर चला गया, चाची!”
(सुनकर महिबा स्तब्ध रह जाती है। वह धीरे से फोन रख देती है और सोच में पड़ जाती है।)
दृश्य दो: अज़हर का बचपन
(शादी के दूसरे दिन महिबा जब घर आती है, तो छोटा अज़हर ज़िद करता है कि उसे भी सेहरा बांधना है। अफरोज़ उसके लिए खास सेहरा बनवाता है। अज़हर खुशी से इधर-उधर घूमता है।)
अज़हर (मासूमियत से) – “चाची, देखो न! मेरा सेहरा कैसा लग रहा है?”
महिबा (हंसकर) -“बहुत प्यारा! आज तो तुम बिल्कुल दूल्हे राजा लग रहे हो!”
(अज़हर बच्चों की मंडली में जाकर अपनी कविताएं सुनाता है, क्रिकेट खेलने का जुनून जाहिर करता है। पूरा परिवार उसे दुलार करता है, लेकिन दादी तबस्सुम सतर्क रहती हैं।)
दादी (सावधान करने के अंदाज में) – “इतना लाड़-प्यार ठीक नहीं! संभाल लो, नहीं तो बिगड़ जाएगा।”
आयशा (हंसते हुए) -“अरे माँ, बस करो! मेरा अज़हर बहुत अच्छा बच्चा है।”
(दादी चिंता से उन्हें देखती हैं, मानो उन्हें भविष्य का अंदेशा हो।)
दृश्य तीन: बिगड़ता अज़हर
(समय बीतता है। अज़हर अब किशोर हो गया है। उसे मीठी सुपारी खाने की लत लग चुकी है। धीरे-धीरे यह तंबाकू और गुटखे में बदल जाती है। पिता अफरोज़ उसे डांटते नहीं, जबकि माँ आयशा उसे छिप-छिपकर सुपारी लाकर देती हैं।)
सूफिया (गंभीर लहजे में) – “भाभी, तुम्हारा अज़हर बिगड़ रहा है। लोग कह रहे हैं, उसे नुक्कड़ पर सिगरेट पीते देखा गया है।”
आयशा (गुस्से में) -“क्या बकवास है! मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता!”
(आयशा दादी के पास जाकर सूफिया की शिकायत करती है। दादी चुपचाप उन्हें देखती हैं, लेकिन कुछ नहीं कहतीं।)
दृश्य चार: नशे की लत
(अज़हर धीरे धीरे अब नशे का आदी हो चुका है। जुए की लत भी लग चुकी है। एक दिन वह नशे की हालत में साइकिल की दुकान के बाहर बेहोश मिलता है। घर में खबर पहुँचती है। आयशा भागकर वहाँ पहुँचती है।)
आयशा (अज़हर को सहारा देते हुए) – “क्या हाल बना लिया है तूने, बेटा?”
अज़हर (लड़खड़ाते हुए) -“अम्मी… मैं अब अच्छा बच्चा बनूँगा… बस आज माफ कर दो!”
(आयशा उसे थप्पड़ मारती है, खुद भी रोती है, लेकिन उसकी लत खत्म नहीं होती। वह चोरी करने तक पर उतर आता है।)
दृश्य पांच: अंतिम चेतावनी
(महिबा अपने नए घर में शिफ्ट हो रही है। अज़हर आता है, कमजोर और टूटा हुआ।)
अज़हर (कमजोर आवाज़ में) – “चाची… मेरे मुँह में एक जख्म हो गया है। ठीक नहीं हो रहा।”
महिबा (आश्चर्य से) – “डॉक्टर को दिखाया?”
अज़हर (दु:खी होकर) – “घरवाले कहते हैं, पैसे की बर्बादी है।”
(महिबा उसे सहानुभूति से देखती है। अब अज़हर का शरीर जवाब दे चुका है। दवा असर नहीं करती, केवल शराब ही उसका दर्द कम करती है।)
महिबा (भावुक होकर) – “अज़हर, यह शराब छोड़ क्यों नहीं देते?”
अज़हर (आँखों में आँसू) -“चाची, अब तो यही मेरी दवा बन गई है… अब जिंदगी पूरी हो गई लगती है।”
(महिबा उसे बेबसी से देखती है। अज़हर का शरीर धीरे-धीरे गल रहा है।)
दृश्य छह: अंतिम विदाई
(रात का समय। अज़हर अपने कमरे में दर्द से कराह रहा है। वह ज़ोर-ज़ोर से पुकारता है—)
अज़हर – “अम्मी… ओ अम्मी!! पानी दो… अना… कोई तो पानी दो!”
(लेकिन सब अनसुना कर देते हैं। सुबह जब दरवाजा खोला जाता है, तो अज़हर दीवार से टिका हुआ होता है— निश्चल।)
अना (फूट-फूट कर रोते हुए) – “चाची, मैंने अपने भाई की आखिरी पुकार क्यों नहीं सुनी? वो प्यासा था… और हम… हमने उसकी आवाज़ तक नहीं सुनी!”
(महिबा के चेहरे पर गहरी उदासी छा जाती है। मंच पर एक गहरी खामोशी छा जाती है।)
(प्रकाश धीमे-धीमे कम होता है। मंच पर अंधेरा छा जाता है।)
समाप्त
रचनाकार
डॉक्टर नाज परवीन
उच्चीकरण एवं स्वरूप परिवर्तन
चैट जीपीटी