आत्मकथ्य |
श्री संजीव कुमार नागर
प्रधानाचार्य, राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, नूरनगर, लिसाड़ी
मैं मानता हूँ कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह समाज, संस्कृति और संस्कारों से मिलकर जीवन की पूर्ण पाठशाला बनती है। हिंदू महापर्व सम्मेलन जैसे आयोजनों में सहभागिता मेरे लिए मात्र औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि एक वैचारिक उत्तरदायित्व है—उस विचारधारा के प्रति, जो व्यक्ति को व्यक्ति से और व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ती है।
इस सम्मेलन में मैंने जो अनुभूति की, वह अत्यंत प्रेरक रही। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ प्रारंभ हुआ यह आयोजन हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करता है। महंत देव मुनि जी महाराज के विचारों ने यह स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म आडंबर नहीं, बल्कि जीवन जीने की दृष्टि है—जिसमें संस्कार, सेवा और समरसता का संतुलन है। एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के रूप में यह संदेश मेरे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आने वाली पीढ़ी को केवल योग्य ही नहीं, बल्कि संस्कारित बनाना भी हमारा दायित्व है।
मुझे गर्व है कि हमारे संस्थान की छात्राओं ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से अखंड भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा को जीवंत किया। उनके आत्मविश्वास, अनुशासन और प्रस्तुति में मुझे उस भारत की झलक दिखी, जिसे हम सब मिलकर गढ़ना चाहते हैं। यह प्रमाण है कि यदि विद्यार्थियों को सही मंच और दिशा मिले, तो वे समाज को नई ऊर्जा दे सकते हैं।
सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों और वक्ताओं के विचारों ने राष्ट्र, परिवार और समाज की एकता पर जो बल दिया, वह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मैं यह विश्वास करता हूँ कि ऐसे रचनात्मक और वैचारिक आयोजन समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करते हैं।
अंत में, मैं सभी अतिथियों, आयोजकों और प्रतिभागियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। मेरा निरंतर प्रयास रहेगा कि राष्ट्रीय इंटर कॉलेज नूरनगर केवल शिक्षा का केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का सशक्त मंच बने।
यही मेरी साधना है, यही मेरा संकल्प।
झलकियाँ

सूचना स्रोत

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




