सबला नारी, कभी ना हारी

सबला नारी, कभी ना हारी

सबला नारी, कभी न हारी

 केदार शर्मा

देह शक्ति में कमतर होना, अभिशापित मेरे लिए बना।

होती है आखिर हार यहीं, होता है अत्याचार घना।

नर तन में कैसै-कैसे कुछ, नर-पशु से नर्तन करते हैं।

भीतर से श्‍वान व्याघ्र जैसे, बाहर से खूब संवरते हैं।

पर अब मुझको अधिकार मिले, कुछ कानूनी हथियार मिले,

अपने पावों पर खड़ी हुई, तो सम्बल के अम्बार मिले।

अब समय सामने खड़ा हुआ, सम्मानित जीवन जीने का।

पीड़ा को भूल हलाहल की, यह मधुर सुधा रस पीने का,

पाटूँगी गहरी खाई को, छूकर नभ की ऊँचाई को।

आलोडि़त कर पाऊँगी मैं, सागर भर की गहराई को।

जन्म-घूँटी संग ही नर में भी, भाव यही भरने होंगे,

वस्तु नहीं मैं मानव हूँ, दुर्भाव सदा हरने होंगे।

सुता संग सुत को भी अब, संस्कार नए देने होंगे।

मानव को मानव समझ सके, ये वचन सदा लेने होंगे।

नारी को पीड़ा देना तो, ईश्‍वर को पीडि़त करना है,

लोरी में गीत बनाकर के, हर नर के मन में भरना है।

फिर मदालसा हो घर-घर में, हो विदुला अरु जीजाबाई।

सबला नारी कभी न हारी, ले अमरावत से अमराई।

प्रेषित मूल रचना

रचयिता

श्री केदार शर्मा

टोंक (राजस्थान)

प्रस्तुति