निमंत्रण
आदरणीय श्री परम सिंह जी के श्रीमति सुखदेवी इन्टर कॉलेज हसनपुर के प्रधानाचार्य के पद से निवृत्त होने के पावन अवसर पर उलझन सुलझन पत्र की ओर से उन्हें शत-शत बधाई तथा उनके प्रति हृदयोदगार
आज चारों ओर छाया लग़ रहा मधुमास है।
हो रहा हर ओर ही है हास और परिहास है।
परम सिंह जी हो रहे हैं सेनानिवृत सम्मान पाकर।
नवल जीवन का नवल पथ आ गया अब पास है।
परम सिंह जी नवजीवन की सबसे पाते आज बधाई।
जीवन भर की आज तपस्या ने है अपनी मंज़िल पाई।
जीवन में सेवा का पाया काल बड़ा ही गहरा सागर।
इसमें डुबकी मार मार ही सेवाधारी भरता गागर।
जिसने पार किया यह सागर उसको मिलती खुशी निराली।
अध्यापन का कर्म है पावन पर में भर देता खुशहाली।
परम स्वयं ही धर्म रूप है सदा धर्म की गाथा गाई।
जीवन भर की आज तपस्या ने है अपनी मंज़िल पाई।।१।।
सेवानिवृत्ति बाद का जीवन होता है एक नूतन जीवन।
संघर्षों के बाद सदा ही मिल पाता है ऐसा जीवन।
जीवन में कितना भी पा लो फिर भी रहती शेष कामना।
जिम्मेवारी शेष बची का करना पड़ता सदा सामना।
परम सिंह जैसों को देखा नहीं कभी आती कठिनाई।
जीवन भर की आज तपस्या ने है अपनी मंज़िल पाई।।२।।
शिव जामाता सन्ध्या पुत्री आज बड़े ही खुश हैं दिखते।
पापा को अब समय-समय ही मन की पूरी करती दिखते।
पुत्रवधु दीक्षा संग हर्षित आज रहे हो महा तरंगित।
पापा अब बस पास रहेंगे इसीलिए वो दिखे उमंगित।
पापा के नवजीवन का कर स्वागत आई है अरुणाई।
जीवन भर की आज तपस्या ने है अपनी मंज़िल पाई।।३।।
परम सिंह हैं महादयालु स्नेह सभी को दिखा टपकता।
उनकी मीठी वाणी को तो बच्चा बच्चा दिखा तरसता।
ऋद्धि-सिद्धी-समृद्धि के संग जीवन इनका सुखमय होवे।
स्वस्थ रहें जीवन में अपने नहीं सामना दु:ख से होवे।
‘उलझन सुलझन’ ने भी उनके सुखी समय की आस लगाई।
जीवन भर की आज तपस्या ने है अपनी मंज़िल पाई।।४।।
रचनाकार
उलझन सुलझन के भावों के आलोक में श्री कृष्णदत्त शर्मा ‘कृष्ण’ द्वारा रचित
प्रस्तुति