एक बार नौकरी के इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरे शौक क्या हैं? किताबों, फ़िल्मों का शौक तो सभी बताते हैं। मैंने सोचा कि कुछ अलग बताऊँ। मैंने कहा, “मेरे शौक हैं-पतंग उड़ाना और चुटकुले सुनाना।” उन्हें समझ नहीं आया कि इस पर क्या सवाल पूछें। उन्होंने कहा- “अच्छा, एक चुटकुला सुनाओ।” मैंने इंटरव्यू में चुटकुला सुनाया। मज़ेदार बात यह रही कि उस नौकरी में मेरा चयन भी हो गया।
मेरी उन लोगों से पूरी सहानुभूति है जिन पर इतनी अधिक ज़िम्मेदारियाँ है कि शौक पूरे करने का समय ही नहीं मिलता। मेरे घर के पास एक किराणा स्टोर है जो सप्ताह के सातों दिन सुबह 7 बजे खुलता है और रात 11 बजे बंद होता है। उस किराणा स्टोर के मालिक को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है, उसे शौक से कोई मतलब नहीं। इसी तरह कई लोग जो सुबह जल्दी काम पर जाते हैं और देर शाम में लौटते हैं, वे भी शौक नहीं पाल सकते। हालांकि मैंने मुंबई की खचाखच भरी ट्रेन में भी लोगों को किताबें पढ़ते और वर्ग पहेली हल करते देखा है, लेकिन जो लोग इतना भी नहीं कर पा रहे, उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हुए मैं यह लेख उन लोगों के लिए लिख रहा हूँ जिनके पास थोड़ा-बहुत खाली समय है या समय काटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
शौक क्या है?
मेरे एक मित्र को पेंटिंग का शौक था। बड़े होने पर उन्होंने साइन बोर्ड पेंट करने की दुकान खोल दी। अब पेंटिंग उनके लिए मात्र शौक नहीं है। उन्हें ग्राहक को खुश भी रखना है और नियमित इतनी कमाई करनी है कि परिवार का पेट पाल सकें। आजकल लोग चुटकुले सुनाकर (स्टैंड अप कॉमेडी से) भी बहुत अच्छा कमा रहे हैं। लेकिन शौक जब आजीविका बन जाए तो दूसरे जोखिम भी उससे जुड़ जाते हैं। आप पर हमेशा सफल होने का दबाव रहता है। मैं एक बैंक में काम करता हूँ और बर्डवाचिंग मेरा शौक है। किसी दिन मैं किसी बाग में या तालाब के किनारे पक्षी देखने जाऊँ और कोई पक्षी न दिखे या मैं अच्छे फ़ोटो न ले पाऊँ तो भी मुझ पर किसी तरह का दबाव नहीं है। यह शौक मुझे विफलता स्वीकार करना सिखाता है। मेरे विफल होने पर भी मेरी आजीविका प्रभावित नहीं होती। लेकिन एक बर्ड गाइड के लिए बर्डवाचिंग शौक नहीं है। उसे अपने क्लाइंट को ‘दुर्लभ’ पक्षी दिखाने के दबाव के साथ जीना है। इस लेख में हम उन गतिविधियों की बात करेंगे जो हमारे लिए फायदे-नुकसान से परे हों। मेरी दृष्टि में शौक वह है जो भीतर से ज़ोर मारे और बगैर किसी बाहरी दबाव के किया जाए।
एक बर्ड गाइड
कुछ लोकप्रिय शौक हैं- किताबें पढ़ना, भ्रमण, ट्रैकिंग, गायन, नृत्य, लेखन, रंगमंच, फ़ोटोग्राफ़ी, चित्रकारी, खेल, टिकट-संग्रह, पाक-कला आदि। कुछ शौक पूरे करने के लिए और लोगों की ज़रूरत पड़ती है जबकि कई शौक आपके अकेलेपन के साथी होते हैं। कई लोग शौकिया तौर पर समाज-सेवा भी करते हैं। सबसे ज़रूरी बात है कि शौक आपको बेहतर इनसान बनाए, आपको बुरी आदतों का गुलाम न बनाए। सोशल मीडिया पर वीडियो, पोस्ट, रील आदि देखते रहना शौक नहीं कहा जा सकता। इसमें अँगूठा चलाने के अलावा आपका कोई योगदान नहीं होता। एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जो लोग स्वयं पोस्ट शेयर नहीं करते, केवल कंटेंट ग्रहण करते रहते हैं, वे बहुत जल्दी नकारात्मकता के शिकार हो जाते हैं।
शौक से आपका जुड़ाव ऐसा हो कि रात में सोते समय आपके मन में असंतोष के लिए जगह न हो और सुबह उठते समय उस शौक का खयाल आपमें ऊर्जा भरे। शौक दैनिक तनाव से राहत तो दिलाता ही है, व्यक्ति के व्यक्तित्व का भी निर्माण करता है। आपकी पहचान का दायरा बढ़ता है। मिलते-जुलते शौक रखने वालों के लिए आजकल फ़ेसबुक ग्रुप, वाट्सऐप ग्रुप आदि के माध्यम से संपर्क में रहना और परस्पर जानकारी शेयर करना आसान हो गया है। इस तरह आपकी पहचान और बातचीत केवल आपके परिवार या कार्यस्थल तक ही सीमित नहीं रहती। नए-नए विषय आपको सकारात्मक ऊर्जा देते हैं। आप विशेषज्ञों से सीख सकते हैं, समान स्तर वालों को प्रोत्साहित कर सकते हैं और उस क्षेत्र के नवागतों का मार्गदर्शन कर सकते हैं।
सकारात्मक ऊर्जा से भरा युवक
शौक पालने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि थोड़े समय बाद शौक आपको पालने लगता है। अगर आप अपने शौक को समय देते हैं, खुद को चमकाते हैं तो समय के साथ शौक आपकी मानसिक, शारीरिक और कई बार आर्थिक स्थिति भी बेहतर कर सकता है। जैसे, शौकिया लेखक को अपनी किताबों से कमाई होने लगे। उस कमाई को आप प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। कमाई पर जब निर्भर हो जाएँगे तो उसे आजीविका कहा जाएगा, शौक नहीं। खैर, कमाई हो न हो, शौक पर मेहनत तो करनी ही पड़ती है। इस बारे में अमीर मीनाई का एक शेर है:
कौन सी जा है जहाँ जल्वा-ए-माशूक नहीं
शौक-ए-दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर।
इसका अर्थ है कि दुनिया में ऐसा क्या है जिसमें सौंदर्य नहीं है। अगर कुछ जानने की इच्छा है तो उसकी बारीकियाँ भी समझनी होंगी। अगर किसी गतिविधि में मेहनत करने का मन नहीं हो रहा है तो मान लीजिए कि वह आपका शौक नहीं हो सकता।
शौक सितारों की तरह हैं। उनकी चमक तभी दिखाई देती है जब चारों ओर अंधेरा हो। व्यक्ति कठिन समय से गुजर रहा हो या किसी वजह से काम पर नहीं जा पा रहा हो, उस समय शौक बहुत सहारा देते हैं। लॉकडाउन के समय पढ़ने और बर्डवाचिंग के शौक ने मुझे हमेशा सकारात्मक रखा। मैं बाल्कनी में बैठकर पक्षियों की गतिविधियाँ देखता और उनके फ़ोटो खींचता। आज भी, परिवार और समाज से दूर होने के बावजूद शनिवार-रविवार को एक जोश रहता है कि कहीं पक्षी देखने जाना है।
सेवानिवृत्ति के बाद तो शौक का महत्व और बढ़ जाता है। अगर व्यक्ति ने काम के अलावा सिर उठाकर दुनिया को नहीं देखा है तो सेवानिवृत्ति के बाद अकेलापन और खालीपन ही रह जाते हैं। खाली बैठे लोगों से कोई बात करना भी पसंद नहीं करता। इसके विपरीत, शौक के लिए समय निकालने वालों के मित्र भी बने रहते हैं और जीवन में निरर्थकता का भाव आसानी से नहीं आता। इसलिए, आजीविका के अलावा कुछ शौक अवश्य होने चाहिए ताकि जीवन में नयापन बना रहे।
मैं अपने शौक पूरे करते समय एक और बात का ध्यान रखता हूँ कि अपने दफ्तर वालों से दूर रहूँ। अगर कोई दफ्तर का कोई व्यक्ति साथ में हो तो घूम-फिरकर दफ्तर की बात निकल ही आती है। मेरे लिए बर्डवाचिंग के समय दफ्तर की बातें करना उतना ही गलत है जितना दफ्तर के समय में बर्डवाचिंग की बात करना। मेरा प्रयास रहता है कि शौक और आजीविका जितने अलग रह सकते हैं, उतने अलग रहें।
आजकल दोस्तों-रिश्तेदारों के यहाँ आना-जाना बहुत कम हो गया है। शादी जैसे कार्यक्रम भी बहुत औपचारिक होकर रह गए हैं। बच्चे बड़े हो जाने के बाद उन्हें आपकी उतनी ज़रूरत नहीं रह गई है। दुनिया इतनी तेज़ी से बदल रही है कि आपको हाशिये पर धकेलती जा रही है और आपका खुद को आउटडेटेड महसूस करना अवश्यंभावी है। ऐसे में शौक का बहुत बड़ा सहारा है। शौक जीवन में आपकी रुचि बनाए रखेंगे और आपको हर तरह के शॉक (झटकों) से उबरने में मदद करेंगे।
रचनाकार
यशवंत गहलोत
प्रस्तुति