सूर्य
सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड या अग्नि का गोला नहीं है, बल्कि वह मानव चेतना, आध्यात्मिकता और जीवन-शक्ति का केंद्रीय स्रोत है। प्राचीन काल से ही विश्व की अनेक सभ्यताओं में सूर्य को ‘ईश्वर’ रूप में पूजा गया है। भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में सूर्य का स्थान सर्वोपरि और आधारभूत माना गया है।
सूर्य के आध्यात्मिक महत्त्व के प्रमुख आयाम इस प्रकार हैं—
आत्मा का प्रतीक
(The Soul of the Universe)
वेदों में कहा गया है— “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”, अर्थात् सूर्य समस्त चराचर जगत की आत्मा है। जैसे शरीर आत्मा के बिना निष्प्राण है, वैसे ही सूर्य के बिना ब्रह्मांड की कल्पना अधूरी है। आध्यात्मिक दृष्टि से सूर्य हमारी अंतरात्मा का प्रतीक है—वह प्रकाश जो भीतर के अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करता है।
ऊर्जा और जीवन-शक्ति का स्रोत
(Source of Prāṇa)
सूर्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा का मूल स्त्रोत है। योग विज्ञान में उसे ‘प्राणदाता’ माना गया है। शरीर की पिंगला नाड़ी, जिसे सूर्य नाड़ी भी कहा जाता है, हमारे भीतर साहस, सक्रियता और जीवन-शक्ति का संचार करती है। सूर्य किरणें न केवल विटामिन-डी प्रदान करती हैं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर हमारी आभा को भी शुद्ध और संतुलित करती हैं।
ज्ञान और प्रबुद्धता का प्रतीक
(Symbol of Wisdom)
सूर्य अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला ज्ञान है। गायत्री मंत्र सूर्यस्वरूप सविता देव को समर्पित है, जिसमें प्रार्थना की जाती है— *“धियो यो नः प्रचोदयात्”*—हे प्रभु, हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। सूर्य यह सिखाता है कि सत्य स्वयं प्रकाशमान होता है; उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।
निस्वार्थ सेवा और अनुशासन
सूर्य का आध्यात्मिक संदेश धर्म और कर्तव्य पर आधारित है। वह बिना किसी भेदभाव के राजा-रंक, पुष्प-कांटे सभी को समान प्रकाश देता है। उसकी निरंतरता और अनुशासन हमें यह सिखाते हैं कि बिना फल की चिंता किए अपने कर्म करते रहना ही जीवन का वास्तविक धर्म है।
यौगिक महत्त्व – सूर्य नमस्कार
हठयोग में सूर्य नमस्कार केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि सूर्य के प्रति कृतज्ञता की एक गहन आध्यात्मिक साधना है। इसके बारह चरण साधक को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ते हैं, जिससे शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य स्थापित होता है।
आध्यात्मिक रूप से सूर्य बाहरी प्रकाश से अधिक हमारे भीतर के प्रकाश का मार्गदर्शक है। वह *“तमसो मा ज्योतिर्गमय”* का सजीव स्वरूप है—अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला शाश्वत गुरु। सूर्य की उपासना वस्तुतः अपने भीतर की दिव्यता, संकल्प-शक्ति और चेतना को जागृत करने की साधना है।
रचनाकार

डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद (गुजरात)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




