लक्ष्य
भूमिका
मानव जीवन केवल समय की यात्रा नहीं है, यह लक्ष्य की खोज और उसे प्राप्त करने की साधना भी है। जब तक जीवन के सामने कोई उद्देश्य नहीं होता, तब तक उसकी गति दिशाहीन प्रतीत होती है। लक्ष्य ही वह शक्ति है जो मनुष्य के भीतर संघर्ष करने का साहस, गिरकर उठने की क्षमता और असफलताओं से सीखकर आगे बढ़ने का विश्वास जगाती है।
डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ की कविता लक्ष्य इसी अदम्य जिजीविषा और अटल संकल्प की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। यह कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि उस साधक की मनोदशा का चित्रण है जो अपने जीवन को एक तपस्या मानकर लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर है। इसमें संघर्ष की कठोरता भी है, परिश्रम का पसीना भी है, और आत्मविश्वास की वह ज्वाला भी है जो हर बाधा को चुनौती देती हुई आगे बढ़ती है।
कविता के प्रत्येक पद में यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर आता है कि सफलता का मार्ग सरल नहीं होता। इसमें उपहास, अवरोध, असफलताएँ और अंधकार के क्षण भी आते हैं, परंतु जो व्यक्ति अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित होता है, वह इन सबको साधना का हिस्सा मानकर आगे बढ़ता रहता है। कवयित्री ने ‘लक्ष्य रथ’, ‘शूल पथ’, ‘अभिमन्यु’ और ‘अर्जुन’ जैसे सशक्त प्रतीकों के माध्यम से यह दर्शाया है कि जीवन की रणभूमि में वही विजयी होता है जो धैर्य, साहस और सतत प्रयास को अपना हथियार बनाता है।
यह रचना युवाओं और संघर्षशील व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी है। इसमें आत्मविश्वास की वह लौ प्रज्वलित होती दिखाई देती है जो व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और अथक परिश्रम के सामने अंततः सफलता को झुकना ही पड़ता है।
इस प्रकार लक्ष्य केवल एक कविता नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का एक प्रेरक घोष है—जो हमें यह स्मरण कराता है कि मन में लक्ष्य स्पष्ट हो, हृदय में साहस हो और कर्म में निरंतरता हो, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं रहती।
लक्ष्य
हर किसी के जीवन में,
होता है अपना लक्ष्य।
कोई पा लेता है मेहनत करके
तो कोई खो जाता है इस भीड़ में।।
हंसने वाले भी बहुत मिले,
टांगें भी खींचने की कोशिश की गई!
क़दम अभी न पीछे हटे हैं,
न कभी ये पीछे हटने वाले हैं!
चाहे साथ मिले या न मिले मुझको,
या फिर मुश्किलें आए हज़ारों!
कोशिशें कभी न कम होंगी,
चाहे प्रयास क्यों न करने पड़ें लाखों!
लंबे हैं अभी भी रास्ते,
मंज़िल भी अभी दूर हैं।
मेहनत बस करते जा रही हूँ,
लक्ष्य को पाने का है पूरा जो जुनून!
लक्ष्य रथ पर चढ़कर,
शूल पथ पर चलकर,
गिर के उठ, उठ के गिर कर,
रथ को बढ़ाना है !!
नींद चैन भूलकर,
दिन-रात एक कर,
एक ही स्वर में गाऊँ,
रथ को चलाना है!!
जीवन को संन्यासी कर,
यज्ञ और हवन कर,
तन-मन-धन सब,
तप में लगाना है !!
हर बाधा को पार कर,
हर हार को भूलकर,
यही मन में धारकर,
लक्ष्य मुझे पाना है!!
अपने लक्ष्य को पाने की भूख
न मिटी है न मिटने देंगे हम,
चाहे राह में आएं अत्यंत बाधाएं
उनसे टकराने का नहीं कोई ग़म!
मन को सामना करना होगा
जीवन में अपने भय का!
डर से भी बड़ा निर्माण करेंगे
आत्मविश्वास अपने हृदय का।
वह सफलता किस काम की
जिसमें न हो संघर्ष का तराना,
असफलता से सीखा है हमने
गिर-गिरकर उठ जाना।
बड़े दिनों के उपरांत लगी है
अब जो इस हृदय में आग,
जब तक न पूरे हो जाते
मिटने न देंगे सपनों का राग।
दृढ़ विश्वास है दिल में
सफल बनेंगे हम एक दिन,
भर लिया उर में साहस
करेंगे आसान, हर राह कठिन।
उम्मीद की न हो कोई किरण
पर होगा वही जो चाहेंगे हम,
चलकर मुश्किल रास्तों पर
पाएँगे लक्ष्य खाई है क़सम।
समस्याएँ, बाधाएँ आएंगी
ये जीवन की अनिवार्य कहानी है!
पाकर सफलता ये सबको
एक दिन हमें सुनानी है।
माना कि लक्ष्य की राह में
आते हैं घनघोर अँधेरे,
संघर्ष, मेहनत और लगन से
पूरे होंगे जरूर सपने हमारे।
लक्ष्य को समक्ष रख,
दिन-रात परिश्रम कर ,
विघ्न बाधाओं से तू ,
बिल्कुल नहीं अब डर!
है सीने में गर अगन,
कुछ कर गुज़रने के लिए,
सोच मत हो जा मगन,
आरज़ुओं को पाने के लिए!
क्या हवा है, क्या फिज़ा है,
तू देख तो कितना मज़ा है,
पसीने से लथ-पथ होकर,
शीतल जल का अपना मज़ा है।।
लक्ष्य-विहीन होकर जीवन,
कुछ और नहीं केवल सज़ा है,
नई उमंग नई तरंग,
जोश-जवानी के संग,
साहस से पूर्ण अंग-अंग,
शत्रु भी देख हो जाये दंग।।
है दम कहाँ किसी और में,
जो जीत ले हमारी ये जंग!
अम्बर से ऊँचा लक्ष्य हो,
तुच्छ दिखता विपक्ष हो,
कोई ज़ोर नहीं, कोई तोड़ नहीं,
मजबूत ऐसा पक्ष हो।।
धरा पर अवसरों की,
है कोई कमी नहीं,
पीछे जो हमने खोया,
आँखों में अब नमी नहीं।।
अवसर अनंत हैं यहाँ,
तू सोच ले जाना कहाँ,
अब मत देख यहाँ-वहाँ,
अर्जुन की भाँति नयन को,
टिका दे लक्ष्य है जहाँ ।।
बाधाएं हैं लाख आतीं
उनके मुताबिक ढल रहे हैं!
मिले जीत या हार कुछ भी
अब हम निकल पड़े हैं!
चक्रव्यूह भेदने को जग का
हम अभिमन्यु से निकल पड़े हैं!
मुसाफिर हैं हम यारों
लक्ष्य ढूंढने चल पड़े हैं!
रचनाकार

डॉ दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अहमदाबाद (गुजरात)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



