नग्न होता समाज

नग्न होता समाज

नग्न होता समाज …?

आज सोशल मीडिया देखकर प्रतीत होता है कि शायद कलयुग समाप्त होकर नग्न युग का आरंभ हो गया है । ‘तुम्हारी सोच छोटी है मेरे वस्त्र नहीं’ ये परम ज्ञान कई बालाओं द्वारा व्यक्त किया जाता रहा है परंतु क्या अर्धनग्न रहना या नग्नता को स्वीकार करना ही प्रगतिशीलता की पहचान हैं ? सभ्यता और शालीनता शायद रूढ़िवादिता का पर्याय बन चुकी है। विशेष रूप से महिलाओं का चारित्रिक पतन प्रदर्शित किया जा रहा है। विज्ञापनों की दृष्टि से देखे हर वस्तु का उपयोग महिलाओं को आपकी और आकर्षित करेगा मसलन दंत मंजन, साबुन, परफ्यूम और भी बहुत कुछ …

धारावाहिक भी पीछे नहीं हैं। उनमें महिलाओं को षड्यंत्रकर्ता और दुष्ट प्रवृति का दिखाकर महिलाओं की छवि धूमिल की जा रही है । आज महिलाओं को ही आगे आकर इन चीजों का प्रतिकार करना चाहिए क्योंकि जिसे प्रगतिशीलता बताया जा रहा है वो नग्नता है, असभ्यता है और अमानवीय है।

…dAyA shArmA