निडर

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हम डर से कभी ना डरते, जीवन में डर से कभी ना मरते।।

ज़िन्दगी अपनी मर्जी से जीते, तो कौन है जो हमें डरायेगा।

माँ-बाप, भाई-बहनों को अपना माना, तो कौन हमें अलग कर पायेगा?

पड़ोसी व मित्रों को सच्चा जाना, तो कौन हमें इनसे दूर कर पायेगा?

पसीना हमनें बहाया, मकान हमनें बनाया, तो कौन है जो इसे तोड़ पायेगा?

खेत हमनें बसाया, ट्रैक्टर हमने चलाया, तो कोई कैसे फसल काट ले जायेगा?

जानवर हमने बसाये, पेड़ हमने लगाये, तो कौन है जो इनको काट पायेगा?

सपने हमने सजाये, लक्ष्य हमने बनाये, तो कौन है जो हमें रोक पायेगा?

संसार हमने रचाया, परिवार हमने सजाया, कौन है जो राह भटकायेगा?

किसी डर से हम ना डरते, गिरकर फिर से उठकर चलते।

स्वार्थ में कभी ना हम पड़ते, कर्म का पेड़ लगाकर, सुख के फल हम जड़ते।

समय के साथ हम चलते,कोध्र कभी ना करते, अकाल मृत्यु से ना मरते।

ईश्वर पर विश्वास हम रखते, गायत्री मंत्र हैं जपते, गीता ज्ञान हम पढ़ते।

इसलिए डर से हम कभी ना डरते, जीवन में डर से कभी ना मरते।।

रचनाकार

कवि मुकेश कुमावत ‘मंगल’

टोंक (राजस्थान)