इच्छाएँ क्यूं ख़त्म नहीं होतीं
यह एक अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक प्रश्न है। इच्छाओं का अंत न होना मानवीय स्वभाव का वह केंद्र बिंदु है, जिसने सदियों से विचारकों और मनीषियों को सोचने पर विवश किया है।
मृगतृष्णा का अंतहीन पथ
इच्छाएँ क्यों ख़त्म नहीं होतीं?
इच्छा मानवीय चेतना का वह बीज है, जो अभाव की कोख से जन्म लेता है। मनुष्य के भीतर एक शाश्वत ‘अपूर्णता’ का बोध होता है, जिसे भरने के लिए वह निरंतर बाहर की वस्तुओं, पद और प्रतिष्ठा की ओर भागता है। लेकिन विडंबना यह है कि यह प्यास पानी पीने से शांत नहीं होती, बल्कि खारे पानी की तरह और बढ़ती जाती है।
‘अगला’ पड़ाव की मानसिकता
हमारी मनोवैज्ञानिक संरचना कुछ ऐसी है कि हम ‘प्राप्ति’ का आनंद लेने के बजाय ‘अप्राप्ति’ पर ध्यान केंद्रित करते हैं। जैसे ही एक लक्ष्य पूरा होता है, मस्तिष्क तुरंत उससे श्रेष्ठ का मानक (Standard) तय कर देता है। जिसे कल तक हम ‘सपना’ कहते थे, उसे हासिल करते ही वह ‘साधारण’ हो जाता है और एक नई आकांक्षा जन्म ले लेती है।
तुलना की स्पर्धा
इच्छाएं अक्सर व्यक्तिगत ज़रूरत से ज़्यादा सामाजिक प्रतिस्पर्धा से जन्म लेती हैं। “मेरे पास क्या है” से अधिक दु:ख इस बात का होता है कि “दूसरे के पास मुझसे बेहतर क्या है।” यह तुलनात्मक सुख (Comparative Happiness) कभी संतुष्ट नहीं होने देता, क्योंकि दुनिया में हमेशा कोई न कोई हमसे आगे रहेगा ही।
परिवर्तनशीलता और अनित्यता
संसार का नियम है परिवर्तन। हम जिन वस्तुओं से सुख खोजते हैं, वे नाशवान हैं। जब कोई वस्तु पुरानी होती है या उसका आकर्षण फीका पड़ता है, तो मन नए रोमांच की तलाश में निकल पड़ता है। इच्छाएं दरअसल मन की उस बोरियत (Boredom) से बचने का रास्ता हैं, जो हमें स्वयं के साथ अकेले बैठने पर महसूस होती है।
जीवविज्ञानी दृष्टिकोण (Dopamine Loop)
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हमारे मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ नामक रसायन सक्रिय होता है, जो हमें किसी चीज़ को पाने की प्रेरणा देता है। पाने के बाद वह आनंद क्षणिक होता है, और मस्तिष्क फिर से उसी ‘रश’ को महसूस करने के लिए नई इच्छा की मांग करता है।
समाधान कहाँ है?
इच्छाओं को बलपूर्वक मारना तो असंभव है, लेकिन उन्हें ‘संस्कारित’ करना संभव है। जब हम ‘संयोग’ (जो मिला है) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो कृतज्ञता (Gratitude) जन्म लेती है।
माननीय सत्य यह है: इच्छाएं नदी के पानी की तरह हैं; यदि वे मर्यादा के तटों में रहें तो जीवन को सींचती हैं, और यदि तट तोड़ दें तो मनुष्य को अतृप्ति के सागर में डुबो देती हैं।
शांति का मार्ग इच्छाओं की शून्यता में नहीं, बल्कि इस बोध में है कि— “मैं जो हूँ, वह पर्याप्त है।”
इच्छाओं के अंतहीन चक्र को समझना वास्तव में स्वयं को समझने जैसा है। जब हम इसे आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक चश्मे से देखते हैं, तो यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि अस्तित्व का एक गहरा संघर्ष प्रतीत होता है।
इच्छाओं का अंतहीन जाल
आध्यात्मिक दृष्टिकोण
‘अहं’ और ‘अज्ञान’
आध्यात्मिक दर्शन के अनुसार, इच्छाएँ मनुष्य की अपूर्णता के बोध से उपजती हैं।
आत्मा की ख़ोज: अध्यात्म कहता है कि मनुष्य मूलतः ‘पूर्ण’ (आनंद स्वरूप) है, लेकिन वह अपनी इस वास्तविकता को भूलकर बाहरी संसार में पूर्णता खोजता है। यह वैसी ही स्थिति है जैसे कस्तूरी मृग अपनी ही सुगंध के लिए वन-वन भटकता है।
अविद्या (Ignorance): वेदान्त के अनुसार, हम नाशवान वस्तुओं (माया) में शाश्वत सुख खोजते हैं। चूँकि वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं, उनसे मिलने वाला सुख भी समाप्त हो जाता है, और व्यक्ति फिर से एक नई इच्छा के पीछे भागने लगता है।
वासना का चक्र: भगवदगीता में कहा गया है कि विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है, और आसक्ति से कामना (इच्छा)। यह एक ऐसा चक्र है जिसे केवल ‘विवेक’ और ‘वैराग्य’ से ही संतुलित किया जा सकता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
‘अनुकूलन’ और ‘अतृप्ति’
मनोविज्ञान इच्छाओं को हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और व्यक्तित्व विकास से जोड़ता है।
हेडोनिक एडप्टेशन (Hedonic Adaptation): यह एक मनोवैज्ञानिक घटना है जहाँ मनुष्य किसी भी बड़ी खुशी या उपलब्धि के बाद बहुत जल्दी अपने ‘सामान्य स्तर’ पर लौट आता है। नई कार या पदोन्नति का सुख कुछ दिनों बाद सामान्य लगने लगता है, और मस्तिष्क फिर से ‘डोपामाइन’ (खुशी का हार्मोन) की तलाश में नई इच्छा पैदा करता है।
अपूर्ण बचपन और असुरक्षा: कई बार इच्छाएँ हमारी आंतरिक असुरक्षा को ढंकने का माध्यम होती हैं। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जिन लोगों को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिलती, वे भौतिक वस्तुओं के संचय (Accumulation) के माध्यम से उस खालीपन को भरने की कोशिश करते हैं।
मैस्लो का पदानुक्रम (Maslow’s Hierarchy): जैसे ही हमारी बुनियादी ज़रूरतें पूरी होती हैं, हम ‘आत्म-सम्मान’ और ‘आत्म-सिद्धि’ जैसी उच्च इच्छाओं की ओर बढ़ते हैं। यानी इच्छा का स्वरूप बदलता है, मात्रा नहीं।
इच्छाएँ मूलतः ‘ऊर्जा’ हैं। यदि ये स्वार्थ और लालच की ओर मुड़ें, तो बंधन बन जाती हैं; और यदि ये सेवा, ज्ञान या रचनात्मकता की ओर मुड़ें, तो विकास का माध्यम बनती हैं। इच्छाओं को ‘खत्म’ करना शायद मानव देह में संभव न हो, लेकिन उन्हे’दृष्टा’ (Observer) बनकर देखना हमें उनकी गुलामी से मुक्त कर सकता है।
इच्छाएँ उस समुद्र की लहरों की तरह हैं, जो कभी शांत नहीं होतीं। शांति लहरों को रोकने में नहीं, बल्कि गहराई में उतरने में है।
सूचना स्रोत

स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अहमदाबाद (गुजरात)
कल्पना

प्रस्तुति


