वेदना

वेदना

वेदना

गीत मैं गाता नहीं

गा रहा हूं वेदना को

टूटे हृदय संवेदना को

अंतर्मन में आह उठती

व्यक्त जतलाता नहीं

गीत मैं गाता नहीं

मौन में भी गीत मेरे

शत्रु भी है मीत मेरे

मन मनन दृष्टि में

समदृष्टि रह पाता नहीं

गीत मैं गाता नहीं

भावों में कोई भाव ना

निकृष्ट है स्वभाव ना

संसार की स्वार्थ धरा

जलजात रह पाता नहीं

गीत मैं गाता नहीं

कोई नहीं सृष्टि में मेरा

पावन सरित दृष्टि में मेरा

परिपूर्ण सागर सा मगर

निर्बाध बह पाता नहीं

गीत मैं गाता नहीं

…dAyA shArmA