शब्दों की आत्मा 

शब्दों की आत्मा 

शब्दों की आत्मा

शब्दों में उलझ गया यह मन,

जो कहना था वह कह न सका।

कुछ शब्द मिले, कुछ वाक्य बने,

लेकिन भावों में बह न सका।

 

चुन- चुन कर शब्दों को परखा,

माणिक – माला में चुन डाला।

सज-धज कर शब्दों ने मिलकर,

मेरे चिंतन को भुन डाला।

 

कुछ शब्द बाण बन घाव किए,

कुछ उस पर मरहम लगा दिए।

कुछ प्रेम की भाषा बोल गए,

कुछ मित्र को घर से भगा दिए।

 

रज-कण से वसुधा निर्मित है,

भाषा शब्दों पर आश्रित है।

भाव मधुर, मन पुलकित हो,

तब शब्द-सृष्टि आह्लादित है।

 

भावों से शब्द उपजते हैं,

भाषा भावों की दासी है।

भाव, शब्द, भाषा, विचार,

सद्वृत्ति बिना उपवासी है।

 

बिंदिया माथे की शोभा है,

भाषा की शोभा शब्द ही है।

बिन भाव निरर्थक शब्द-जाल,

शब्दों की आत्मा भाव ही है।

……लालबिहारी शर्मा ‘अनंत’

मुंबई, 13 सितम्बर 2026