भूमिका
कवि, स्तंभकार और व्यंग्यकार श्री केदार शर्मा जी का उलझन सुलझन के सर्वप्रथम योगदान के लिए उनका हार्दिक आभार।
सर्दी की ऋतु का चला, कुदरत में अब राज।
जीव जगत सब बदलते, जीने का अंदाज।।१।।
जड़ चेतन सब शीत में, पहन शीत का ताज।
सहमी सहमी सी हवा, करे धूप पर नाज।।२।।
कितना मंदा हो गया, सूरज का यह तेज।
धरती जैसे बन गयी, सर्द बर्फ सी सेज।।३।।
फसलें खेतों में खड़ी, चिंताग्रस्त किसान।
ऐसा सब कुछ सोचता, नष्ट नहीं हो धान।।४।।
मौज उड़े धनवान की,हीटर गीजर संग।
खान-पान नव वसन के,हर दिन बदले रंग।।५।।
निर्धन तो नित दिन गिने,कितनी दूर बसंत।
जालिम ठिठुरन गलन का,होगा कब तक अंत।।६।।
दूर-दूर तक घेरता, मौन धुंध का जाल।
पत्तों से आँसू झरे,पादप गण बेहाल।।७।।
शीत-लहर ऐसे चुभे, जेसे ठंडे तीर ।
बेघर पशुओं की सुने,कौन मौन सी पीर।।८।।
पंख दिवस ने समेटे,पर फैलाती रात।
धीमे-धीमे हो रहा शिखरों,पर हिमपात।।९।।
चाय पकौड़ी रेवड़ी,मूंगफली का दोर।
बैठ पास में ताप के बतियाते चहुँ ओर।।१०।।
सूचना स्रोत
श्री केदार शर्मा
प्रस्तुति