स्वप्न सुंदरी

स्वप्न सुंदरी

‘स्वप्न सुन्दरी’

सपने में आकर एक स्वप्न सुन्दरी बोली,

मुझे बना लो तुम अपने जीवन की हमजोली,

जीवन भर साथ रहूँगी, नहीं करूँगी मनमानी,

आप मेरे राजा हो, मुझे बना लो अपनी रानी।।

मैंने नजर उठाई, सामने स्वप्न सुन्दरी पाई,

स्वप्न सुन्दरी की सुन्दरता से, चांदनी भी शरमाई,

मैंने थोड़ा उसको देखा, तो मिट ग‌ई मेरी तन्हाई,

मैंने हाथ बढ़ाया, तो थोड़ी सी वह शरमाई।।

मैं स्वप्न सुन्दरी से बोला कि तुम मेरे घर आ जाओ,

उजड़े हुए उपवन में, फिर से कलियाँ खिला जाओ,

मेरे घर आँगन में, खुशियों के सुमन खिला जाओ,

मेरे निराश बूढ़े माँ-बाप के जीवन में प्राण फूँक जाओ।

हम दोनों ने बात बढ़ाई, सपने में हुई सगाई,

मैं उसका बना आदमी, वह बन गई मेरी लुगाई,

इतने में माँ ने आवाज लगाई, बुद्धि मेरी चकराई,

सपना मेरा टूट गया, भाग्य मुझसे फिर रूठ गया।।

रचनाकार

कवि मुकेश कुमावत मंगल

टोंक राजस्थान।

प्रस्तुति