अंबुआ तले

अंबुवा तले फिर कब झूले पड़ेगे…

मानसून का आगमन होते ही धरती की प्यास बुझ जाती है! तब प्रकृति हरी-भरी चुनर से सज-धज के आँखों को लुभाने लगती है। मिट्टी की सौंधी -सौंधी खुशबू दिल में अजीब सी उमंगें जगा देती है। मन का मयूरा मस्ती की पायल पहनकर रिमझिम बारिश की बूँदों के साथ ताल से ताल मिलाते हुए सब कुछ भुला कर नाचने लगता है। बारिश की बूँदें हरी-हरी पत्तियों पर ठहर कर किसी सहमी, सकुचाई सी नवयौवना की तरह खूबसूरत नजर आने लगती है। सावन के महीने में झूला झूलना सदियों से चला आ रहा है। शायद ही कोई होगा जिसने बचपन में झूले का मजा ना लिया हो। बाँहों का झूला …..सबसे खूबसूरत झूला जिसका आनंद हर किसी ने लिया है। छोटे बच्चों के रोने पर जब उन्हें बाँहों में लेकर आगे-पीछे झुलाया जाता है तो वह टेंशन फ्री होकर सो जाते हैं। कहने का मतलब झूले की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है। पर बड़े होने के बाद जिंदगी वह मौके हमें नहीं देती। पर हम चाहें तो यह मौके तलाश कर सकते हैं। खासतौर पर सावन के महीने में! जब हर तरफ हरियाली ही हरियाली होती है! उसमें हमारा झूला झूलना हमें एनर्जी से भर देता है क्योंकि झूले अक्सर पीपल,बरगद,आम इन पेड़ों की डालियों पर ही डाले जाते हैं जिनसे हमें भरपूर ऑक्सीजन मिलता है। झूला झूलने से सिर्फ मन ही आनंदित नहीं होता अपितु तन को भी ढेरों फायदे होते हैं!

सबसे पहली बात झूला झूलने के लिए हमें अपने शरीर में बैलेंस बनाना पड़ता है, जिसमें काफी मेहनत लगती है। यही वजह है कि हमारी कैलोरी बर्न होती है। झूला झूलते समय पूरे शरीर की एक्सरसाइज हो जाती है। हमारे सारे मसल्स एक्टिव हो जाते हैं ।हम जब झूले को आगे-पीछे लेते हैं तब हाथ, पैर, उंगलियां ,पीठ, कमर सबकी मसल्स एक साथ एक्टिव होकर हमें टेंशन फ्री कर देती है ।कुछ देर के लिए हम सब कुछ भूल जाते हैं। झूले की बढ़ती रफ्तार से भय के साथ-साथ आनंदित होकर आँखें बार-बार बंद होती व खुलती है, जिसकी वजह से आँखों का भी व्यायाम हो जाता है। सांसों की गति भी झूले की रफ्तार के साथ एक लय बनाकर चलने लगती है। इस तरह प्राणायाम भी हो जाता है।जब अपने लाइफ पार्टनर के साथ एक दूसरे को सपोर्ट करते हुए आप झूला झूलते हैं तो रिश्तो में प्रगाढ़ता और प्यार दोनों ही बढ़ता है। आँखों-आँखों में इशारे….. लहराते फूलों की तरह। पत्तियों पर थमी बारिश की बूंदों की तरह एहसासों में भीगने को आतुर हो उठते हैं। दिल कहता है ….सावन के झूले पड़े ।तुम चले आओ।

पर आज झूलों की अहमियत कहीं खो गई है। अब ना तो शहरों में पेड़ बचे हैं, ना ही एकल परिवारों के दौर में झूला झूलने की चाहत बची है। कभी पेड़ पर पड़ी रस्सी से तैयार झूला सावन के महीने में आनंद का प्रतीक होता था जो परंपराओं से भी जुड़ा था। मगर आज झूला थ्रील यानी रोमांच का पर्याय बन चुका है।कई पार्कों में श्रावणी माहौल बनाने के लिए कृत्रिम फुहारों का सहारा लिया जाता है। अब बड़े शहरों में ही नहीं छोटे शहरों में भी हाईटेक झूले अपनी लोकप्रियता बनाए हुए हैं।

पर जिस तरह कागज के फूलों से कभी खुशबू नहीं आती,उसी तरह बनावटी फुहार और ये झूले हमें वह आनंद और लाभ नहीं दे सकते जो प्रकृति से जुड़कर हमें मिलता था।

विजया डालमिया संपादक मेरी निहारिका

राष्ट्रीय संयोजिका उलझन-सुलझन महिला लेखिका प्रकोष्ठ