शख्सियत

शख्सियत

दूजे के होठों को देकर अपने गीत… जाने चले जाते हैं कहाँ…
दर्द भरे नग़मों के देवता और मखमली गीतों के बादशाह मुकेश के गीत जितने कर्णप्रिय हैं, उतने ही लोकप्रिय भी। राज कपूर की आवाज़ कहलाने वाले इस महान गायक का हर गीत हमें ज़िंदगी की किसी न किसी सच्चाई से रूबरू कराता रहा है।
आवाज़ के इस जादूगर का संगीतमय सफ़र यक़ीनन हमें उस दौर में ले जाता है, जहाँ हम अनायास ही गुनगुना उठते हैं—
“सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं…
हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं…”
यादों के भँवर में डुबो देने वाले मेरा नाम जोकर के गीत को भला कौन भूल सकता है? बीते दिनों की कसक और शिकायत को अपने भीतर समेटे—
“जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी याद में
नज़रों को हम बिछाएँगे…”
यादों की बात हो और बचपन याद न आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है? देवर फ़िल्म का यह गीत हर किसी को अपने बचपन की गलियों में वापस ले जाता है—
“आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम,
गुज़रा ज़माना बचपन का…”
इसी तरह अपनी तक़दीर से बतियाते हुए मर्यादा फ़िल्म में जब वे गाते हैं—
“ज़ुबाँ पे दर्द भरी दास्ताँ चली आई…”
तो सुनने वाले की आँखों में भी दर्द बनकर आँसू उतर आते हैं।
रानी रूपमती में रूठे हुए मीत को मनाने के लिए गाया गया गीत विरह की पीड़ा को पूरी शिद्दत से महसूस कराता है—
“आ लौट के आजा मेरे मीत…”
और तीसरी कसम का वह गीत, जिसमें वे जैसे स्वयं भगवान से ही सवाल करते हैं—
“दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई,
काहे को दुनिया बनाई…”
आज भी मन को भीतर तक छू जाता है।
सादगी और प्रेम को अहमियत देते हुए बड़ी मासूमियत से गाया गया चांद सी महबूबा हो मेरी आज भी हर उम्र के लोगों की ज़ुबान पर है—
“चाँद सी महबूबा हो मेरी, कब ऐसा मैंने सोचा था…”
पर कहते हैं न—जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि! नायिका की खूबसूरती का बखान करना हो तो मुकेश की आवाज़ में यह गीत अपने आप में एक खूबसूरत तस्वीर उकेर देता है—
“चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे…”
इश्क़ में दीवानगी लाज़िमी है और सनम की बेरुख़ी कितना दर्द देती है, यह उनके गीतों में बखूबी महसूस किया जा सकता है—
“दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पर क्या गुज़री है…”
या फिर उपासना का वह गीत—
“दर्पण को देखा तूने जब-जब किया सिंगार,
फूलों को देखा तूने जब-जब आई बहार…”
और यहूदी का—
“ये मेरा दीवानापन है, या मोहब्बत का कसूर…”
प्रेम की उसी मासूम बेचैनी को आवाज़ देता है।
आँखों में भले ही आँसू हों, किंतु खुशी के मौक़े पर भी होंठों से दुआएँ ही निकलती हैं। मुकेश की आवाज़ में यह भाव कितना खूबसूरत लगता है—
“मुबारक हो सबको समा ये सुहाना,
मैं खुश हूँ मेरे आँसुओं पे न जाना…”
या फिर—
“खुशी की वो रात आ गई,
कोई गीत बजने दो…”
आवाज़ के इस जादूगर ने देशभक्ति के गीतों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी,
सर पर लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…”
और उनके साथ पूरा देश सुर में सुर मिलाकर गा उठा—
“होंठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है,
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है…”
आनंद फ़िल्म का—
“कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए…”
अपने आप में भावनाओं और सौंदर्य का अद्भुत संगम है।
उसी तरह जल बिन मछली, नृत्य बिन बिजली का गीत—
“तारों में सजके, अपने प्रीतम से देखो,
धरती चली मिलने…”
हमें भीतर तक उतरकर सोचने पर मजबूर कर देता है।
खुद को आवारा और अनाड़ी समझने वाले मुकेश गायन और स्वभाव—दोनों में ही बेमिसाल थे। तभी तो अनाड़ी फ़िल्म का यह गीत वे इतनी खूबसूरती से गा गए—
“किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,
जीना इसी का नाम है…”
प्यार में किसी भी शर्त को न मानते हुए, एकतरफ़ा प्रेम की पवित्रता को भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी—
“तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको,
मेरी बात और है, मैंने तो मोहब्बत की है…”
“कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है…” से लेकर
“मैं पल दो पल का शायर हूँ…”
तक न जाने कितने गीत उनकी आवाज़ में अमर हो गए।
फिर आया वह गीत, जो जैसे जीवन का दर्शन ही बन गया—
“इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल,
जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल…”
और—
“दूजे के होठों को देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़ फिर दुनिया से गोल…”
गीत गाने वाला यह महान गायक एक दिन सचमुच इस दुनिया से चला गया और पीछे छोड़ गया अपनी आवाज़ की वह अमिट निशानी, जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।
जाते-जाते जैसे स्वयं कह गया—
“हम छोड़ चले हैं महफ़िल को,
याद आए कभी तो मत रोना…”
लेकिन मुकेश के चाहने वाले उन्हें भुला कहाँ पाए! आज भी जब कोई अपना बिछड़ता है, जब कोई पुरानी याद आँखों को नम कर जाती है, तो उनकी आवाज़ अनायास ही कानों में गूँज उठती है—
“ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना…”
मुकेश चले गए, मगर उनके गीत आज भी हमारे बीच हैं—
कभी मुस्कान बनकर, कभी आँसू बनकर, कभी याद बनकर और कभी ज़िंदगी की सच्चाई बनकर।
दूजे के होठों को देकर अपने गीत…
जाने चले जाते हैं कहाँ…
और शायद महान कलाकार कभी जाते ही नहीं—
वे अपने गीतों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

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