वृक्ष-मित्र
प्रमिला त्रिवेदी जी, स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन, बेंगलुरु महिला प्रकोष्ठ

वृक्ष-मित्र

कल ब्लॉग पर एक लेख पढ़ा जिसका टाइटल था वृक्ष-मित्र जो मुझे बहुत सुंदर लगा! सच में वृक्ष से बढ़कर कोई मित्र नहीं हो सकता! हम जब तक जीवित रहते हैं तब तक वृक्ष हमें आक्सीजन देते हैं, प्राण वायु मिलती है और जब हमारा अंतिम सफ़र होता है वृक्ष तब भी हमारा साथ नहीं छोडता, कोई हमारे साथ नहीं जाता एक वृक्ष ही हमारे साथ जलता भी है। इससे ज्यादा कोई क्या निभाएगा मित्रता?

अंतिम सफर का साथी

कहते हैं इंसान अकेला आता,

अकेला ही जाता है,

पर मैंने देखा है—

कोई उसके साथ भी आता है।

एक वृक्ष होता है,

जो चुपचाप खड़ा रहता है,

अंतिम सफर की आहट सुनकर

अपने अस्तित्व से जुड़ जाता है।

जिसने जीवन भर छाया दी,

पत्तों में सरगम सजाई,

धूप में राह दिखाई,

वही अंत समय में

अपनी लकड़ियाँ लेकर चला आता है।

इंसान से पहले खुद जलता है,

फिर उसे पंचतत्व में मिलाता है,

बिना किसी शिकायत के

अपना अंतिम धर्म निभाता है।

कितना निःस्वार्थ रिश्ता है—

न कोई वचन, न कोई दावा,

फिर भी आखिरी क्षण तक

साथ निभाने का निभाता है।

इसलिए जब भी कोई वृक्ष दिखे,

उसे यूँ ही मत काट देना,

क्या पता किसी की अंतिम यात्रा का

मौन साथी बनना हो उसे।

पेड़ केवल पेड़ नहीं,

जीवन का विश्वास हैं,

हमारी साँसों के प्रहरी

और अंत समय के भी पास हैं।

कहते हैं इंसान अकेला जाता है—

शायद यह बात अधूरी है,

क्योंकि उसकी अंतिम अग्नि में

एक वृक्ष की भी आहुति पूरी है।

प्रमिला त्रिवेदी का यह विचार सचमुच बहुत मार्मिक है। ‘वृक्ष-मित्र’ की अवधारणा केवल वृक्षों के पर्यावरणीय महत्व तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मनुष्य और वृक्ष के बीच उस अदृश्य रिश्ते को सामने लाती है, जिसमें वृक्ष जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के साथ खड़ा दिखाई देता है।

जीवन में हम मित्रता को अक्सर साथ देने, सुख-दुःख बाँटने और आवश्यकता के समय काम आने से जोड़ते हैं। इस कसौटी पर देखें तो वृक्ष की मित्रता अद्भुत है—वह बिना कुछ माँगे देता है। साँसों के लिए प्राणवायु, धूप में छाया, भूख के लिए फल, घर के लिए लकड़ी, पक्षियों के लिए आश्रय और धरती के लिए हरियाली।

और प्रमिला त्रिवेदी की रचना का सबसे मार्मिक बिंदु यही है कि मनुष्य के अंतिम सफर में भी वृक्ष उसका साथ नहीं छोड़ता। जीवन भर जिसने अपनी छाया से मनुष्य को ढका, अंत में वही अपने शरीर का अंश देकर उसकी अंतिम यात्रा पूरी करने में सहभागी बनता है।

इस भाव को थोड़ा और व्यापक रूप में देखें तो प्रश्न केवल यह नहीं है कि वृक्ष हमारे लिए क्या करता है? असली प्रश्न यह है—हम वृक्ष के लिए क्या करते हैं?

जिस वृक्ष को हमने मित्र कहा, क्या उसके लिए हमारे व्यवहार में मित्रता भी है?

क्या हम एक वृक्ष लगाने के बाद उसे बड़ा होने तक अपना दायित्व मानते हैं?

क्या हम अनावश्यक रूप से किसी वृक्ष को कटने से बचाते हैं?

क्या हम अपने बच्चों को यह बताते हैं कि पेड़ केवल लकड़ी, फल या छाया देने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-चक्र के सहयात्री हैं?

शायद इसी कारण वृक्षारोपण से अधिक महत्वपूर्ण वृक्ष-मित्रता है। पेड़ लगाना एक दिन का कार्य हो सकता है, लेकिन उसे बचाना, सींचना और बड़ा होते देखना निरंतर मित्रता निभाना है।

प्रमिला जी की पंक्तियाँ हमें एक सुंदर और गंभीर सत्य की ओर ले जाती हैं—जिस वृक्ष ने हमारी पूरी जिंदगी को सहारा दिया, उसके अस्तित्व की रक्षा करना भी हमारी मनुष्यता का हिस्सा है।

सच ही तो है—

इंसान जीवन में अनेक मित्र बनाता है, लेकिन वृक्ष ऐसा मित्र है जो बिना बोले जीवन भर देता रहता है और अंतिम क्षण में भी अपना साथ निभाता है।

सृजक

प्रमिला त्रिवेदी जी, स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन, बेंगलुरु महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन