शायद यह बात सच हो
शायद यह बात सच हो
राखी के त्योहार पर मन में कितने उतार-चढ़ाव आते हों।
भाई को शायद बोझिल लगे राखी,
बहन भी इस जिम्मेदारी से कतराती हो।
न आता मन से बुलावा भाई का तो,
बहन भी जाने में हिचकिचाती हो।
शायद यह बात सच हो……
न रहती हो अब वह उमंग और उत्साह भी।
महंगाई की मार उसकी जेब पर भारी हो।
फिर भी हिम्मत कर अच्छे-से-अच्छा करने की कोशिश हो।
फिर भी उसकी कोशिश भाभी की नजरों में कमतर हो।
भाई भी शायद उसके खर्चे को तोलता हो।
या फिर उसके पास भी कुछ भी गुंजाइश न हो।
और इस तरह यह त्यौहार उधेड़बुन बन जाता हो।
शायद यह बात सच हो…..
भाई-बहन के मन में भी अब यह औपचारिकता रह गई हो।
चल रही इस परंपरा को निभा रहे हों।
निभा कर भी मन में शायद खुश ना हों।
बहन को हो कुछ उम्मीद और उसकी उम्मीद पूरी न होती हो।
भाई भी इस उम्मीद पर उसे कोसता हो।
भाभी भी भला-बुरा कहती हो।
दिखता नहीं खर्चा, हमारी स्थिति और खुद की बनाने चल पड़ी।
शायद यह बात सच हो…….
इसी डर से बहन मन की बात न कहती हो।
और हर बार दिल की ख्वाहिश दिल में दबाकर चली आती हो।
कहीं बुरा न लग जाए भाई-भाभी को यह बात भी सताती हो।
कितने छिछले और कमजोर हो गए रिश्ते,
इस बात का भान शायद बहन को हो,
और जब-जब राखी आती है वह कुछ उलझन में रहती हो।
शायद यह बात सच हो ……
सुनिता मीना
उपप्राचार्य और स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन, सवाई माधोपुर महिला प्रकोष्ठ
राजस्थान
प्रस्तुति

