सच क्या है?
उलझन सुलझन

सच क्या है?

शायद यह बात सच हो 

शायद यह बात सच हो

राखी के त्योहार पर मन में कितने उतार-चढ़ाव आते हों।

भाई को शायद बोझिल लगे राखी,

बहन भी इस जिम्मेदारी से कतराती हो।

न आता मन से बुलावा भाई का तो,

बहन भी जाने में हिचकिचाती हो।

शायद यह बात सच हो……

न रहती हो अब वह उमंग और उत्साह भी।

महंगाई की मार उसकी जेब पर भारी हो।

फिर भी हिम्मत कर अच्छे-से-अच्छा करने की कोशिश हो।

फिर भी उसकी कोशिश भाभी की नजरों में कमतर हो।

भाई भी शायद उसके खर्चे को तोलता हो।

या फिर उसके पास भी कुछ भी गुंजाइश न हो।

और इस तरह यह त्यौहार उधेड़बुन बन जाता हो।

शायद यह बात सच हो…..

भाई-बहन के मन में भी अब यह औपचारिकता रह गई हो।

चल रही इस परंपरा को निभा रहे हों।

निभा कर भी मन में शायद खुश ना हों।

बहन को हो कुछ उम्मीद और उसकी उम्मीद पूरी न होती हो।

भाई भी इस उम्मीद पर उसे कोसता हो।

भाभी भी भला-बुरा कहती हो।

दिखता नहीं खर्चा, हमारी स्थिति और खुद की बनाने चल पड़ी।

शायद यह बात सच हो…….

इसी डर से बहन मन की बात न कहती हो।

और हर बार दिल की ख्वाहिश दिल में दबाकर चली आती हो।

कहीं बुरा न लग जाए भाई-भाभी को यह बात भी सताती हो।

कितने छिछले और कमजोर हो गए रिश्ते,

इस बात का भान शायद बहन को हो,

और जब-जब राखी आती है वह कुछ उलझन में रहती हो।

शायद यह बात सच हो ……

राखी का लिफ़ाफ़ा 

राखी का लिफाफा आता है,

और शगुन का लिफाफा जाता है।

न हो लिफाफा तो सीधे फोन में पहुंच जाता है।

यह है आज के रक्षाबंधन का एक पक्ष।

कहां है इसमें वो सब भाव,
प्रेम, लगन, आत्मीयता, वो अपनों के साथ बिताए पल।

राखी का लिफाफा आता है….
रिश्ते नहीं आ सकते लिफाफे में।

फिर उनका वजूद भी छोटा होता जाता है।

यह तो खाना पूर्ति वाली बात हुई। रिश्तों में फिर जान कहां रही।

हम हर जगह खाना पूर्ति करने लगे। रिश्तो में, प्रेम में, त्याग में, समर्पण में।

आज ऐसा क्यों हो रहा ?
शायद किसी के पास इसका जवाब नहीं,
क्योंकि इसके जिम्मेदार भी हम हैं। राखी का लिफाफा आता है…..

अब रिश्ते कहाँ बचे? 

चाचा, ताऊ नहीं रहे,

आस पड़ोस के काका, काकी,

माई, बाबा, दा ‘जी भी नहीं बचे।

पहले पूरा गांव परिवार होता था।

अब परिवार भी परिवार नहीं रहा।

संयुक्त परिवार तो दूर की बात,

एकल से भी एक परिवार हो गए।

अब रिश्ते कहां बचे …

दो भाई भी अब साथ नहीं रह पा रहे।

ताऊ – ताई तो कहीं छूट गए।

भाई-भाई में भी अपनापन, प्रेम खो गया।

भाई-बहन भी तो अब आए गए हो गए।

नहीं रही कहीं भी वो निश्चलता, आत्मीयता।

जितने भाई-बहन कम हुए,

उतनी आत्मीयता कम हुई।

अब रिश्ते कहां बचे ….

भाई भाई से नहीं बोलता,

बहन भाई से नहीं बोलती।

न जाने कैसी जंग छिड़ी हुई।

नहीं बची अब ताकत रिश्तों में,

कि सब फिर से एक हो जाए।
सबका अहम, ईगो चरम पर बैठा।

कोई भी तो झुकने को तैयार नहीं।

अब ऐसी दम घोटू स्थिति में भला रिश्ते कैसे जिंदा रहे।

और इस तरह से सब रिश्ते मरते चले गए।

रिश्तों की दुनिया सिमटती गई।

दुनिया का आकार बढ़ता गया।

वास्तविकता घटती गई।

कल्पना बढ़ती गई।

हां यह सच है,

अब रिश्ते कहां बचे ……

सृजक

सुनिता मीना
उपप्राचार्य और स्थानीय संपादिका

उलझन सुलझन, सवाई माधोपुर महिला प्रकोष्ठ
राजस्थान

प्रस्तुति

उलझन सुलझन