कविता
उलझन सुलझन

कविता

मुझे तो भगवान ने जन्म ही दिया है

तुम ढूँढते रहो मंदिरों में भगवान,
मैंने तो उन्हें अपने घर में देखा है,
किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं,
माँ की ममता और
पापा के संस्कारों में देखा है।

जब मैं छोटी थी,
मेरी दुनिया बहुत छोटी थी—
माँ का आँचल,
पापा की उँगली,
घर की चार दीवारें
और उन्हीं में बसी
मेरी पूरी दुनिया थी।

तब कहाँ समझती थी
कि घर चलाना सिर्फ रोटी बनाना नहीं,
बच्चों को पालना सिर्फ उन्हें बड़ा करना नहीं,
और माता-पिता होना
सिर्फ जन्म दे देना नहीं होता।

माँ के चेहरे पर
मैंने तब सिर्फ मुस्कान देखी थी,
उनकी थकान नहीं।
पापा की आवाज़ में
मैंने सिर्फ सख्ती सुनी थी,
उनकी चिंता नहीं।

माँ सुबह से रात तक
मेरे लिए लगी रहती थी,
कभी मेरी छोटी जरूरत,
कभी मेरी छोटी जिद,
कभी मेरी छोटी-सी खुशी—
हर बात उसके लिए बड़ी थी।

वह खुद थक जाती,
फिर भी कहती—
“तू खा ले, मैं बाद में खा लूँगी।”

तब मुझे क्या पता था
कि उस ‘बाद में’ में
माँ कितनी बार
अपनी भूख भूल जाती थी।

पापा भी जाने कितनी चिंताओं को
सीने में दबाकर घर आते थे,
लेकिन मेरे सामने
चेहरे पर परेशानी नहीं,
हौसला रखते थे।

उनकी हथेली कठोर थी,
पर मेरे लिए
उसमें हमेशा सुरक्षा थी।

जब मैं कोई गलती करती,
पापा मुझे रोकते थे,
माँ समझाती थी।

कभी उनकी डाँट अच्छी नहीं लगती थी,
कभी लगता था—
मेरी ही हर बात पर रोक क्यों?
मुझे मेरी मर्जी से जीने क्यों नहीं देते?

पर आज जब जिंदगी ने
थोड़ा समझदार बनाया है,
तो एक सवाल खुद से करती हूँ—

अगर वो मुझे
हर गलत काम के लिए नहीं टोकते,
अगर मेरी हर गलती पर
चुप रह जाते,
अगर सही और गलत का फर्क
मुझे समझाते ही नहीं,
तो क्या मैं आज
सही राह पर चल पाती?

शायद नहीं।

आज समझती हूँ—
पापा की ‘ना’
मेरे जीवन की सबसे बड़ी ‘हाँ’ थी।

माँ की डाँट
मेरी आज़ादी छीनने के लिए नहीं,
मेरी जिंदगी सँवारने के लिए थी।

उन्होंने मुझे
दुनिया से डरना नहीं सिखाया,
बल्कि दुनिया को समझना सिखाया।

उन्होंने कहा—
हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती,
हर मीठी बात करने वाला अपना नहीं होता,
और हर आसान रास्ता
सही रास्ता नहीं होता।

उनके शब्द तब
उपदेश लगते थे,
आज वो ही शब्द
मेरी जिंदगी के संस्कार हैं।

माँ-पापा ने
मेरे लिए सिर्फ कपड़े और किताबें नहीं जुटाईं,
उन्होंने मेरे भीतर
एक सोच बनाई।

उन्होंने मुझे यह नहीं सिखाया
कि जिंदगी हमेशा आसान होगी,
उन्होंने सिखाया—
मुश्किल आए तो खुद को मजबूत रखना।

उन्होंने मुझे यह नहीं कहा
कि हर कोई तुम्हारे साथ रहेगा,
उन्होंने सिखाया—
अकेली पड़ो तो भी सही रास्ता मत छोड़ना।

और शायद यही
माता-पिता का सबसे बड़ा संघर्ष होता है—
बच्चे को अपने पास रखकर भी
उसे एक दिन
अपने बिना जीना सिखाना।

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ
तो लगता है,
मेरे बचपन की कितनी चीज़ें
मैंने तब समझी ही नहीं।

माँ की बची हुई रोटी,
पापा की पुरानी चीज़ें,
उनकी अपनी इच्छाओं का रुक जाना,
मेरी छोटी खुशियों के लिए
उनका बड़े सपनों को टाल देना—

तब ये सब सामान्य लगता था,
आज लगता है
यही तो प्रेम था।

उन्होंने मेरे लिए
कितना छोड़ा होगा,
यह हिसाब मैं कभी नहीं लगा सकती।

क्योंकि माता-पिता
अपने त्याग की रसीद नहीं रखते,
वे बस बच्चों की खुशी देखकर
सब भूल जाते हैं।

आज मैं बड़ी हो गई हूँ,
मेरी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं,
मेरे अपने संघर्ष हैं।

अब कभी मैं थकती हूँ,
कभी मन टूटता है,
कभी किसी बात से दु:खी होती हूँ,
तो अनायास बचपन याद आता है—

पापा की उँगली,
माँ का आँचल,
उनकी डाँट,
उनकी सीख,
और वह छोटा-सा घर
जहाँ मेरे लिए
दो लोग पूरी दुनिया से लड़ सकते थे।

तब समझ नहीं पाई थी,
आज समझती हूँ—

माँ ने मुझे सिर्फ पाला नहीं,
मुझे भीतर से बनाया है।

पापा ने मुझे सिर्फ चलना नहीं सिखाया,
सही दिशा में चलना सिखाया है।

अगर आज मेरे भीतर
कुछ अच्छाई है,
कुछ संस्कार हैं,
कुछ गलत के सामने रुक जाने का साहस है,
तो उसके पीछे
मेरे माता-पिता की अनगिनत सीखें हैं।

इसलिए आज
अगर कोई मुझसे पूछे—
“तुम्हारे जीवन का पहला भगवान कौन था?”

तो मैं किसी मंदिर का नाम नहीं लूँगी।

मैं बस कहूँगी—

एक माँ,
जिसने अपने आँचल में
मेरी पूरी दुनिया समेट ली।

एक पिता,
जिसने अपनी उँगली पकड़ाकर
मुझे जिंदगी की राह दिखाई।

तुम ढूँढ़ते रहो मंदिरों में भगवान,
मैं तो उस घर को प्रणाम करती हूँ
जहाँ मेरे आने से पहले
दो लोग संघर्ष कर रहे थे,
और मेरे आने के बाद
उन्होंने अपने सपनों से पहले
मेरे सपनों को जगह दी।

आज मन करता है
उनके सामने बैठकर बस इतना कह दूँ—

माँ, आपकी डाँट तब समझ नहीं आई,
आज वही मेरी समझ बन गई है।

पापा, आपकी सख्ती तब अच्छी नहीं लगी,
आज वही मेरी ताकत बन गई है।

और अगर कभी
मेरे जीवन में कोई अच्छाई दिखाई दे,
तो समझ लेना—
वह मेरी अकेली कमाई नहीं है,
उसमें मेरे माँ-पापा के
संस्कारों की पूरी उम्र लगी है।

तुम ढूँढ़ते रहो मंदिरों में भगवान,
मुझे नहीं जाना बहुत दूर—

मुझे तो भगवान ने
माँ की गोद में रखकर
और पापा की उँगली थमाकर
जन्म ही दिया है।

सरोज प्रसाद राय
उलझन सुलझन, स्थानीय संपादिका
जयपुर महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन