पंचायत रा चुनाव
(राजस्थानी हास्य एवं जागरूकता कविता)
देखो पंचायता म सरपंच ही सरपंच खड़ा हो रिया छः,
मोकला पीसा लगा र, गांव म सबस्यू बड़ा हो रिया छः,
जो घर रा मुखिया तो कदी व बण ही कोनी सक्या,
अर पंचायता रा मुखिया बणबा री सोच रिया छः।।
बड़ा-बड़ा पोस्टर लगार, प्रचार-प्रसार कर रिया छः,
आपणो सिर, लोंगा रा चरणा मायी धर रिया छः,
जो बन स्वार्थ कदी घर स्यू बाहर कोनी निकल्या,
आज सगला घरका, घर-घर जा र वोट मांग रिया छः।।
सगला प्रत्याशी रात म, सरपंची रा सपणा देख रिया छः,
ए.आई. स्यू फोटू लगार, सरपंची कुर्सी पर बैठ रिया छः,
जो कदी भलाई रे वास्ते, दो रुपया खर्च कोनी कर सक्या,
अर आज लाख-करोड़ री बड़ी-बड़ी बातां फांक रिया छः।।
लोग-लुगायां, सगला ही सगला रा मजा लें रिया छः,
पीसा खा र, सगला न वोट देबा रो वादों कर रिया छः,
टीम रा लोग तो आपरा सरपंच न जीता बा ताई,
नया-नया समीकरण लगा र, रोज ही जीता रिया छः।।
सरपंच बणबा स्यू पहले ही, भलाई रो काम करता,
सच्चाई स्यू लोंगा रो मन जीत र, आपणो नाम करता,
तो अपणे को जताणे री इतणी जरूरत कोनी पड़ती,
अर बिना कुछ करया ही, सरपंची रो काम जरूर करता।।
अब तो सगला न जागरूक होने रो बगत आ गयो,
सच्चा और अच्छा सरपंच चुणबा रो बगत आ गयो,
लोभ-लालच अर अपणा-पराया री रीत न छोड़ र,
कर्मठ, काबिल, शिक्षित सरपंच चुणने रो बगत आ गयो।।
सृजक
कवि — मुकेश कुमावत मंगल
स्थानीय संपादक, उलझन सुलझन
टोंक (राजस्थान)
प्रस्तुति
