होड़
उलझन सुलझन

होड़

मेरी कोई होड़ नहीं…

न किसी से मेरी शिकायत है,
न किसी से कुछ कहने की चाहत,
न किसी से मेरी बराबरी है,
न किसी से आगे निकलने की कोई आकांक्षा।
मेरी ज़िंदगी मेरी अपनी है,
मेरे हर ख़्वाब और हर दर्द का
अपना ही एक संसार है।
कुछ अनुभूतियाँ ऐसी हैं,
जिन्हें शब्दों की नहीं,
केवल मौन की आवश्यकता होती है।
मुझे किसी से होड़ करना
शायद कभी आया ही नहीं,
क्योंकि मैंने जीवन को
दूसरों से आगे निकलने की दौड़ नहीं,
स्वयं तक पहुँचने की यात्रा माना है।
मैं हर पल स्वयं को परखती हूँ,
हर अनुभव के आईने में
अपने ही अस्तित्व को देखती हूँ।
हर पटल पर, हर मंच पर
मेरी प्रतिस्पर्धा किसी और से नहीं,
मेरे अपने ही कल से होती है।
कौन कितना आगे है,
किसने क्या पाया, किसने क्या खोया,
अब इन प्रश्नों से मेरा कोई नाता नहीं।
मैं तो बस यह जानना चाहती हूँ
कि अपने भीतर के सत्य से
कितनी दूर हूँ और कितनी पास।
क्योंकि जीवन का सबसे गहरा रहस्य यही है—
हर व्यक्ति की यात्रा अलग है,
हर संघर्ष की भाषा अलग है,
और हर मंज़िल का अर्थ भी अपना है।
मुझे किसी को पीछे छोड़कर
आगे नहीं बढ़ना,
मुझे तो बस स्वयं को खोए बिना
जीवन के हर पड़ाव से गुजरना है।
मेरी कोई होड़ नहीं किसी से,
मेरी यात्रा है स्वयं से स्वयं तक।

सृजक

रेणु लूथरा

प्रस्तुति

उलझन सुलझन