भारत की माटी, कला और संस्कृति के नाम
कहीं बाँस की बारीक बुनावट,
कहीं मिट्टी की सुंदर सजावट,
कहीं लकड़ी पर उकेरे अरमान,
कहीं रंगों में रची पहचान।
हर राज्य का अपना रंग है,
हर शिल्प में अनूठा ढंग है,
कहीं कठपुतली की मुस्कान,
कहीं बंधेज की अलग शान।
असम के बाँस की कलाकारी,
राजस्थान की माटी प्यारी,
कहीं चाक पर मिट्टी घूमती,
कहीं कारीगर की कला झूमती।
कहीं मधुबनी के रंग निराले,
कहीं कश्मीर के पश्मीने प्यारे,
कहीं गुजरात की कच्छ कढ़ाई,
कहीं पंजाब की फुलकारी छाई।
कहीं लकड़ी के खिलौने बोलें,
कहीं हस्तकला के रंग घोलें,
कहीं धागों में सपने बुने,
कहीं पत्थर में आकार चुने।
हर वस्तु में श्रम की गाथा,
हर कला में पुरखों की परिभाषा,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो सँवरती आई,
वही हमारी विरासत कहलायी।
इन रंगों को निहारते-निहारते,
मन के कुछ पुराने द्वार खुले,
मिट्टी, पुट्टी से कुछ गढ़ने के,
मन में फिर अरमान पले।
कितनी सुंदर सृजन की भाषा,
हाथों में कितनी अद्भुत आशा,
एक साधारण वस्तु को कलाकार,
दे देता है कितना सुंदर आकार।
ये केवल बाजारों की रौनक नहीं,
ये संस्कृति की जीवित पहचान हैं,
इन कारीगरों के हाथों में,
भारत की सदियों की शान है।
आओ इनके हुनर को मान दें,
लोककलाओं को नया सम्मान दें,
जब तक मिट्टी में महक रहेगी,
तब तक संस्कृति भी महकती रहेगी।
न मिटने दें इन रंगों की छाया,
न खोने दें पुरखों की माया,
कला बचेगी तो पहचान रहेगी,
भारत की संस्कृति सदा महान रहेगी।
सरोज प्रसाद राय
