एक दिन जली मोमबत्ती

एक दिन जली मोमबत्ती

एक दिन जली मोमबत्ती,

उसकी रोशनी से जगमगा उठा घर का कोना-कोना।

अपनी ही बाती की आग में पिघलने लगी मोमबत्ती और पिघलती चली गई,

बस पिघलती चली गई।

किसी साँचे में रखी मोमबत्ती फिर ढलने लगी उसी आकार में।

उसके ह्रदय में लगा जीवन स्तम्भ रूपी धागा भी धीरे-धीरे जलता हुआ उड़ता चला गया धुंआ बनकर ।

पानी बनकर तल से चिपकी मोमबत्ती,

धीमी पड़ती लौ में धुंधलाई रोशनी के साथ समाप्त कर चुकी थी अपना अस्तित्व।

शेष रह गया था तो मात्र कुछ अंश जो चिपका रह गया था उस साँचे में।

एक धागे के सहारे फिर पुनर्जन्म के साथ बनकर खड़ी हो गई थी एक और मोमबत्ती।

रचयिता

संदीप कुमार जैन”नवोदित”

ककोड, टोंक ( राज )

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प्रस्तुति