दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।
अलग अलग रँग मिलकर अद्भुत छटा दिखायें रे।।
दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।।
अपनी बुरी आदतें तो, होली के साथ जला दो।
होली के पश्चात् जगत में, हर इंसान भला हो।।
अच्छे और सच्चे लोगों को, ईश्वर स्वयं बचाये रे।
दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।।
लाल, हरा, पीला या नीला, कोई रँग लगा दो।
बुरे को जो अच्छा कर दे, सबको वही दवा दो।।
ढेरों खुशियाँ बाँटो, कोई दु:खी नहीं रह जाये रे।
दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।।
इंसानों के दुश्मन को ना, सम्मानित दर्जा दो।
इंसानों की कीमत समझे, ऐसी उसे सजा दो।।
सूरदास, रसखान संग में, आकर भजन सुनाये रे।।।
दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।
मनमुटाव भूलकर, एक दूजे को गले लगा लो।
होली का संदेश है ये, जन-जन को इसे बता दो।।
पंडित, मुल्ला एक संग, आयत, भजन सुनायें रे।।।
दुनिया में कैसे एकता हो, होली के रँग बतायें रे।
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रचनाकार
रमन ‘सिसौनवी’ (पूर्व प्रशिक्षक)
प्रस्तुति