कविता ‘लाल्ली’

कविता ‘लाल्ली’

लाल्ली

‘लाल्ली’ का सम्बोधन ऐसा लाड़ टपकता दिखता है।

बेटी बहना हर लड़‌की से यह पावनतम रिश्ता है।।

 

छोटी बहना को जब भैया खुश होकर ‘लाल्ली’ कहता।

तब अनुजा के लिए हृदय में प्यार मनोरम है बहता।

कभी-कभी तो जीवन भर को ‘लाल्ली’ नाम पड़ा मिलता।

यदि गया हो विवाह भी उसका फिर भी नाम नहीं छुटता।

‘लाल्ली’ सुनकर उसका भी मन सदा सुमन सा खिलता है।

बेटी बहना हर लड़‌की से यह पावनतम रिश्ता है।।१।।

 

गांव में ज्यादातर ही लड़‌की ‘लाल्ली’ बोली जाती हैं।

सदा बड़ों से ‘लाल्ली’ सुनकर ‘लाल्ली’ खुद सुख पाती हैं।

कोई विवाहित लड़‌की जब भी अपने नेहर आती है।

‘लाल्ली’ कब आई? कैसी है? सबसे सुनती पाती है।

‘लाल्ली’ वाला शब्द शहद से भाव कसैला मिटता है।

बेटी बहना हर लड़‌की से यह पावनतम रिश्ता है।।२।।

 

‘लाल्ली’ बिखराती लाली है घर के कोने-कोने में।

हर घर का भावुक हो जाता उसके नयन भिगोने में।

मगर नगर के कोलाहल में ‘लाल्ली’ नहीं खोजे मिलती।

हर ‘लाल्ली’ के लिए शहर में कुदृष्टि बहुधा टिकती।

‘लाल्ली’ जैसा पावन रिश्ता सदा नगर में बिकता है।

बेटी बहना हर लड़‌की से यह पावनतम रिश्ता है।।३।।

 

‘लाल्ली’ हेतु जात पांत का भेद न गाँवों में होता।

‘लाल्ली’ के हर सुख दु:ख में ही पूरा गाँव खड़ा होता।

लेकिन गाँवों में भी देखा राजनीति रंग बरस रहा।

‘लाल्ली’ का यह नाम स्वयं ही निज ‘लाली’ को तरस रहा।

‘लाल्ली’ सम्मुख नाम स्नेह का नहीं कोई भी टिकता है।

बेटी बहना हर लड़की से यह पावनतम रिश्ता है॥४।।

 

लड़कों को ‘लाल्ला’ लड़‌की का ‘लाल्ली’ नाम पुराना है।

कृष्ण को ‘लाल्ला’ राधा ‘लाल्ली’ पूर्ण ब्रज ने जाना है।

कृष्ण और राधा से ‘लाल्ला’ ‘लाल्ली’ नाम दिखे आये।

इन नामों में इस कारण ही भक्ति भाव छुपे पाये।

कृष्ण कन्हैया राधा सा सुख इन नामों में मिलता है।

बेटी बहना हर लड़की से यह पावनतम रिश्ता है॥५।।

 

राम कहाये राम लला पर कृष्ण कहाये नन्द लाल्ला।

इस लाल्ला ने अपने रंग में पूर्ण ब्रज को रंग डाला।

राधा भी इस लाल्ला को लख ‘लाल्ली’ बन दौड़ी आई।

यह ही राधा घर घर में अब ‘लाल्ली’ बन कर मुस्काई।

जब ‘लाल्ली’ पर अनाचार हो ये ही रिश्ता रिसता है।

बेटी बहना हर लड़की से यह पावनतम रिश्ता है॥६।।

रचयिता

श्री कृष्णदत्त शर्मा ‘कृष्ण’