सार छंद 16/12 मात्राभार
चरणांत 2, 2
तुलसी
आँगन में तुलसी है हँसती,
हर दिन दीप जलाता।
पात-पात में साँसें बस्तीं,
आस्था के स्वर गाता।।
औषधीय गुण बसते इसमें,
जीवन सजता जाए।
माटी में रहकर तुलसी जी,
श्रृद्धा को उपजाए।।
सुबह-सुबह की ओस समेटे,
हर पत्ती वरदानी।
घर-घर में पूजी जाती है,
संस्कृति की है वाणी।।
जीवन शुद्ध, सरल करती है,
प्रणाम तुलसी माता।
दीप जले जब साँझ-सवेरे,
तुम साँसों की दाता ।।
मन के मैल मिटाती तुलसी,
शुचिता कण बरसाती।
घर-आँगन में हँसती रहती,
हर दिन भक्ति जगाती।।
पत्ती-पत्ती मंत्र बनी है,
जीवन-पथ बतलाती।
रोग-शोक को हर लेती माँ,
मन पावन कर जाती।।
रचनाकार

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



