तुलसी
डॉ छाया शर्मा

तुलसी

सार छंद 16/12 मात्राभार

चरणांत 2, 2

तुलसी

आँगन में तुलसी है हँसती,

हर दिन दीप जलाता।

पात-पात में साँसें बस्तीं,

आस्था के स्वर गाता।।

 

औषधीय गुण बसते इसमें,

जीवन सजता जाए।

माटी में रहकर तुलसी जी,

श्रृद्धा को उपजाए।।

 

सुबह-सुबह की ओस समेटे,

हर पत्ती वरदानी।

घर-घर में पूजी जाती है,

संस्कृति की है वाणी।।

 

जीवन शुद्ध, सरल करती है,

प्रणाम तुलसी माता।

दीप जले जब साँझ-सवेरे,

तुम साँसों की दाता ।।

 

मन के मैल मिटाती तुलसी,

शुचिता कण बरसाती।

घर-आँगन में हँसती रहती,

हर दिन भक्ति जगाती।।

 

पत्ती-पत्ती मंत्र बनी है,

जीवन-पथ बतलाती।

रोग-शोक को हर लेती माँ,

मन पावन कर जाती।।

रचनाकार

डॉ छाया शर्मा

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति