‘अक़्सर’
अक़्सर हम वहीं मिलते हैं, जहाँ से हमें जाना था,
उन्हीं पुराने रास्तों पर, जिन्हें पीछे छोड़ आना था।
ज़िंदगी के फ़लसफे भी बड़े अजीब हैं साहिब,
जिसे भूलना चाहा दिल ने, उसे ही अक़्सर गुनगुनाना था।
अक़्सर हम ख़ामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं,
जब शोर के दरिया में शब्द दम तोड़ देते हैं।
सोचते हैं कि वक़्त मुट्ठी में क़ैद है हमारे,
पर रेत की तरह वक़्त ही हमें अक़्सर छोड़ देता है।
चेहरों की इस भीड़ में, मुखौटे हज़ार हैं,
दिखती है जो हक़ीक़त,
वो अक़्सर उधार है।
हम ढूँढते रहे ईश्वर को पत्थरों के शहर में,
जबकि वो तो हमारे ही भीतर, अक़्सर बेकरार है।
कि़ताबों के पन्ने पलटते हुए ये समझ आया,
जो मिल गया वो मिट्टी, जिसे खोया वो साया।
सुकून की तलाश में हम मीलों चल पड़े,
पर सुकून तो हमारे घर की उसी अक़्सर वाली चाय में था।
अंत में बस यही एक मलाल रह जाता है,
कि,
मानव जीने की हसरत में, जीना ही अक़्सर भूल जाता है।
रचनाकार

डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद (गुजरात)
प्रस्तुति


