जिन्दगी से मौलिक साक्षात्कार

जिन्दगी

भूमिका – जीवन से संवाद करती हुई यह रचना स्त्री-मन की उस अदम्य चेतना को उद्घाटित करती है, जो पीड़ा, बंधन, उदासी और नकारात्मकता के हर प्रहार को आत्मबल, प्रेम, आशा और मुस्कान में रूपांतरित कर देने की सामर्थ्य रखती है। यहाँ ‘जिन्दगी’ एक चुनौती बनकर सामने आती है—कभी तन्हाई देती हुई, कभी पाँवों में बेड़ियाँ डालती हुई, कभी रास्तों में नफ़रत और निराशा के पहाड़ खड़े करती हुई—और उसके प्रत्युत्तर में रचनाकार प्रमिला त्रिवेदी का स्वर जीवन से हार न मानने का साहसिक उद्घोष बन जाता है। यह कविता टूटने का नहीं, भीतर से और अधिक सजग होकर जीने का संकल्प है; जहाँ संवाद स्वयं से होता है, उड़ान मन के आकाश में भरी जाती है और हर अँधियारे के विरुद्ध आशा का झरना फूट पड़ता है। पाठक जब इस रचना में प्रवेश करता है, तो वह केवल पंक्तियाँ नहीं पढ़ता, बल्कि अपने ही भीतर छिपी उस जिजीविषा से साक्षात्कार करता है, जो तमाम कोशिशों के बावजूद मिटती नहीं—बल्कि जीवन को स्वयं में जीकर और अधिक अर्थपूर्ण बना देती है। आइए रूबरू होइए रचनाकार के भावों से।

जिन्दगी से मौलिक साक्षात्कार

तू कर तन्हा मुझे

मैं खुद से बतियाऊँगी

तू भर आँखों में उदासी की शाम का धुधँलका

मैं होंठों पे मुस्कान का सूरज उगाऊँगी

तू लगा पैरों में बदिंशों की साँकलें

मैं मन के आकाश में उडान भर आऊँगी

तू उडेल राहों में नफरतों का ज्वालामुखी

मैं प्रेम के दरिया सी बह जाऊँगी

तू खड़े कर निराशा के पहाड़

मैं आशा के झरने सी फूट आऊँगी

तू कर लाख कोशिश, मुझे मिटाने की जिन्दगी

मैं फिर भी तुझे खुद में जीकर ही जाऊँगी

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी

भूमिका और चित्र सृजन सहयोग

चैट जीपीटी (नवाचार सहायक)

साज सज्जा और कल्पनाकार

कल्पनाकार है शब्दशिल्प

प्रस्तुति

जागरूकता मासिक और पोर्टल सृजक